उत्तराखंड के युवा गायक मनीष की नेगी दा को शिक्षक दिवस पर ‘लायुं छो भाग’गीत की सौगात !

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भारतीय गणराज्य के दूसरे राष्ट्रपति डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्मदिवस यानि 05 सितम्बर को 1962 से शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है,शिक्षकों के उत्कृष्ट कार्यों को इस दिन याद किया जाता है,और शिक्षण गतिविधियों को छोड़कर इस दिन विद्यालयों में हर्षोउल्लास का अवसर होता है। 

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इन दिनों विद्यालय तो कोरोना काल के दौरान खुले नहीं हैं लेकिन शिक्षकों को विभिन्न माध्यमों से बधाई सन्देश मिल रहे हैं,भारतीय सभ्यता में गुरु का विशेष महत्त्व रहा है और इन्हें ईश्वर का दर्जा प्राप्त है,इसका व्याखान संत कबीर ने बेहद ही शानदार शब्दों में किया था’ गुरु गोविन्द दोनों खड़े काके लागूं पायं,बलिहारी गुरु अपने गोविन्द दियो बताय’ अर्थात कभी ऐसा समय आ जाए गुरु और ईश्वर दोनों एकसाथ खड़े हों तो अपने गुरु के पैर पकड़िए उन्हीं की बदौलत आप इस काबिल हुए हो कि हरि दर्शन हुए हैं।

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गुरु जीवन में अक्षर ज्ञान से लेकर जीवन जीने का ज्ञान भी सिखलाते हैं,जिस मन गुरु सम्मान हो वहीँ जीवन में सफल हुआ है,गुरु का तात्पर्य मात्र एक अध्यापक से ही नहीं है हर वो व्यक्तित्व जिससे आप प्रभावित होते हो जिससे आपके ज्ञान में एक बूँद भी वृद्धि हो वही गुरु कहलाया है। विविधताओं वाले देश में गुरुओं के भी कई स्वरूप मिलते हैं,कोई व्यवसाय में गुरु होता है कोई अन्य क्षेत्रों में।

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ऐसे ही एक गुरु को उत्तराखंड के युवा गायक मनीष नेगी ने शिक्षक दिवस पर गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी को उन्हीं का एक गीत लायों छो भाग गीत समर्पित किया है,इसे अर्पित शिखर ने संगीत दिया है,नेगी दा उत्तराखंड संगीत जगत के वो वृक्ष हैं जिनकी छाया अगर किसी युवा गायक पर पड़े तो काफी कुछ सीखा जा सकता है।लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी ने अपना पूरा जीवन ही उत्तराखंडी संगीत को समर्पित कर दिया और अनगिनत गीतों की रचना जारी है।

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उत्तरखंड संगीत जगत से जुड़े युवा गायक नेगी दा के ही गीतों को सुनकर बड़े हुए हैं और हमारी 2 पीढ़ी भी इन्हीं के गीतों की शौकीन रही है,चाहे रेडियो का दौर रहा हो फिर सीडी,डीवीडी का दौर और अब डिजिटल दौर इनका आज तक कोई मुकाबला नहीं कर पाया,ये तो एक विशालकाय वृक्ष की भांति आकाश की ऊंचाई नापते रहे,युवा गायक ने अपने नेगी दा को ये गीत समर्पित करके उन्हें गुरु सम्मान दिया है।

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लायुं छो भाग गीत से गढ़रत्न नेगी ने तत्कालीन एवं वर्तमान स्थतियों का वर्णन किया था इस गीत में किस्मत और मेहनत का जिक्र है कि ईश्वर ने दिया भरपूर है लेकिन इसे अपनी मेहनत अपने हाथों से संवारना होगा,सबके हाथों में अपने जीवन की बागडोर है अब कोई कैसे इसे खींचता है वो उसी पर निर्भर है,लेकिन कई बार अनजाने में इंसान वो भूल कर जाता है जिसका जीवन भर मलाल रहता है कभी कभी दूसरों की सलाह भी हानिकारक सिद्ध होती है।

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