जब शिव के तीसरे नेत्र से कामदेव हुये थे भस्म …. पार्वती का हुआ वरण।

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shiv shankar

बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाती होली ना केवल मिलन, समन्वय और प्रेम की गाथा ही है, अपितु रंगों में सराबोर होने का समर्पण भाव भी है। होली, जहां जीजा- साली, देवर- भाभी के मौन प्रेम का प्रतीक है, वहीं मां- बाप , भाई बहिन के बीच दुलार का भाव भी रखता हैै। बसंत ऋतु के आगमन का सूचक जहां प्रकृति अपने नैसर्गिक रंगों में रंगी होती है, वहीं गर्मी का आगाज करने का उतावली होली ठंड के मौसम से निजात दिलाने को भी उत्सुक रहती है।

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होली मनाने के पीछे कई कहानियां स्पष्ट हैं। पौराणिक कथाओं की बात करें तो राक्षसराज हिरण्यकश्यप केवल राक्षसों की पूजा करता था, उसे देवताओं की शक्ति और उनके पराक्रम पर रत्ती भर भी विश्वास नहीं रहा। दर्प में चूर हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र प्रह्लाद को राज्य को बेहतर चलाने और पराक्रमी बनाने के लिये आश्रम में दीक्षा लेने के लिये भेज दिया। वहां पर गुरूजनों के सानिध्य में बजाय आसुरी शक्ति प्राप्त करने के उन्होने भगवान विष्णु की उपासना करना शुरू कर दिया। आश्रमी दीक्षा के इतर जब भक्त प्रह्लाद भगवान की पूजा में रत होने लगा तो, एक दिन राजा हिरण्यकश्यप की आज्ञा को पाकर गुरूजनों ने प्रह्लाद को समझाने की बहुत कोशिश भी की। लेकिन प्रभु भक्ति में लीन प्रह्लाद ने एक ना सुनी। और निरंतर भगवान विष्णु की सेवा में रत रहने लगे।

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प्रह्लाद की भावना और भक्ति भाव को देखकर राजा हिरण्यकश्यप ने अपने बेटे को मारने की कई योजनायें बनाई, लेकिन हर बार प्रह्लाद का जीवन बच जाता। एक दिन उसने अपनी बहिन होलिका को प्रह्लाद को गोद में रखकर आग से जलाने की योजना बनाई। भगवान शिव का होलिका को एक ऐसा वस्त्र भेंट किया था, कि उसे ओढ़कर उसे अग्नि भी जला नहीं सकती थी, ऐसे वस्त्र को पहनकर होलिका ने प्रह्लाद को गोद में रख दिया। अन्य सैनिकों ने उन दोनों को आग के हवाले कर दिया। प्रह्लाद ने चुपचाप आखें बंद करके हरि स्मरण शुरू कर दिया, कुछ ही पल में होलिका के शरीर से कपड़ा निकल गया, और भक्त प्रह्लाद के शरीर पर खुद ब खुद चिपक गया, अग्नि ने होलिका को जलाकर भस्म कर दिया, वहीं प्रह्लाद का बाल भी बांका नहीं हुआ। ऐसे ही एक दिन प्रह्लाद को खंभे पर बांधकर मारने की योजना बनाई गयी, इसी दिन खंभा फाड़कर भगवान विष्णु नरसिंह भगवान के अवतार में आये, और उन्होंने हिरण्यकश्यप का पेट फाड़कर उसे मौत के हवाले कर दिया।

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दूसरी कथा के अनुसार जब पर्वतराज हिमालय की पुत्री पार्वती भगवान शिव को वर रूप में प्राप्त करना चाह रही थी, तब भगवान शिव को तपस्या में बैठे देखकर पार्वती ने कई वर्षों तक प्रभु का इंतजार किया। इस बीच कामदेव आये, और उन्होंने पार्वती की परेशानी का सबब पूछा। पार्वती ने बताया कि वह भगवान शिव को वर रूप में प्राप्त करना चाहती है। कामदेव ने सुंदर स्त्री का रूप रखकर भगवान शिव की तपस्या भंग की, इससे क्रोधित होकर शिव ने तीसरे नेत्र से कामदेव को जलाकर भस्म कर दिया। तब पार्वती को पीछे देखकर भगवान शिव के मन में प्रेम भर गया,इसी मौके फायदा उठाकर पार्वती ने अपने मन की बात शिव के समक्ष रख दी।

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कामदेव का अपनी शरीर का बड़ा ही अहंकार था, जिसे अग्नि की भेंट चढ़ाकर भगवान शिव ने कामदेव के अहंकार का जला दिया। सनातन काल से चली आ रही परंपराओं को अक्षुण्ण रखने की दिशा में हिन्दु लोग इस परंपरा का पालन करते हैं। और होली पर होलिका या कामदेव के अहंकार के दहन के रूप में उसे अग्नि के हवाले करते हैं, और एक दूसरे को अबीर, गुलाल लगाकर प्रेम, भाईचारा और मित्रता का संदेश देते हैं। होली पर रंगों का विशेष महत्व है, लाल रंग जहां उत्साह और सौभाग्य को दर्शाता है, वहीं गुलाल प्रेम और प्यार को दिखाता है, हरा रंग आपनी भाईचारे और मित्रता को प्रगाढ़ बनाता है। इस होली पर जरूर होलिका दहन के रूप में आप सभी अपनी अहंकार और किसी गलत आदत का परित्याग करें। सभी पाठक वर्ग को होली की अनंत शुभकामनायें।

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हिलीवुड न्यूज़ के लिए बिपिन सेमवाल की विशेष रिपोर्ट:

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