ढोल-दमाऊ और जागर गीतों के साथ ग्रामीणों ने की धान की अंंतिम रोपाई,पढ़ें रिपोर्ट।

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ढोल-दमाऊ और जागर गीतों के साथ ग्रामीणों ने की धान की अंंतिम रोपाई,पढ़ें रिपोर्ट।

चमोली (Chamoli) के दशोली विकासखंड के सैकोट गांव में ढोल-दमाऊ औऱ जागर गीतों के साथ ग्रामीणों ने धान की अंतिम रोपाई की. जिसे देखते हुए ग्रामीणों ने गांव की अंतिम धान की रोपाई को यादगार बना दिया. इस दौरान महिलाओं की आंखे छलक पड़ी.

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उत्तराखंड की परंपरा को जीवंत रखने का एक प्रयास चमोली के दशोली विकासखंड के सैकोट गांव में देखने को मिल रहा है. जहां ग्रामीणों ने धान की अंतिम रोपाई ढोल-दमाऊ औऱ जागर गीतों के साथ की. इस दौरान खेतों में रोपाई करती हुई महिलाओं की आंखें भर आई. अंतिम रोपाई होने का अहम वजह को लेकर ग्रामीणों में अपनी भूमि से बिछड़ने का दर्द उजागर हो रहा है.

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दरअसल उत्तराखंड के धाम केदारनाथ और बद्रीनाथ के लिए मुख्य रेलवे स्टेशन का निर्माण होना है. चारधाम रेलवे प्रोजेक्ट के तहत गांव की 200 के अधिक नाली भूमि अधिग्रहित की गई है. जानकारी के मुताबिक ग्रामीणों का कहना है कि आने वाले साल से रेलवे स्टेशन का काम शुरू हो जाएगाय और गांव के खेतों में धान की रोपाई नहीं हो पाएगी. जिससे यह रोपाई गांव की अंतिम धान की रोपाई को यादगार बन गई.

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वहीं हर साल गांव में धान की रोपाई की तैयारियां एक महीने पहले से शुरू हो जाती है. इसके लिए धान की बिज्वाड़ यानी धान के पौधे की निराई-गुडाई गांव की सभी महिलाएं एकजुट हो जाती है. औऱ ग्रामीण बड़े उत्साह औऱ प्रसन्नता के साथ खेतों में रोपाई करते हैं. लेकिन इस साल की रोपाई ग्रामीणों के लिए आखिरी रोपाई होगी. धान की रोपाई करते हुए खेतों में ग्रामीणों ने इस बार बैलों की जोड़ी के साथ ही ढोल-दमाऊ लेकर पहुंचे. औऱ महिलाओं ने जीतू बगड़वाल के जागरों के साथ धान की रोपाई की.

बता दें कि सैकोट गांव में लगभग 150 परिवार रहते हैं. यहां के ग्रामीणों का व्यवसाय कृषि व पशुपालन है. जिससे अभी तक गांव से पलायन नहीं हुआ है. औऱ अब रेलवे प्रोजेक्ट के चलते ग्रामीणों को अपने खेत गंवाने पड़ेगें. इसका दर्द उन्होंने अनूठी पंरपरा के जरिए जाहिर किया है. गांव के लोगों के लिए रोपाई (रोपणी) किसी उत्सव से कम नहीं होता है. महिलाएं रोपाई के एक दिन पहले  क्यारी से धान की बिज्वाड़ (पौधे) निकालती है. दूसरे दिन पूजा करने के बाद रोपाई का काम शुरू कर दिया जाता है. इस दिन खेतों में काम करने वाले के लिए कई विषेश पकवान भी तैयार किए जाते हैं. हालांकि अब समय के बदलते दौर में हमारी परंपरा लगातार कम होती जा रही हैं.

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