लोकपर्व, फुलारी ! याद दिलाता इंसान का अस्तित्व ? क्या है फुलारी ,वीडियो जरूर देखें।

0
451
FULARI

वसंत का स्वागत उत्तराखण्ड में पूरी दुनिया से अलग अंदाज में किया जाता है, आज हिन्दू नववर्ष चैत्र के प्रथम दिवस यानि 1 गते को उत्तराखण्ड के पर्वतीय अंचल में एक पर्व मनाया जाता है जो फूलदेई के नाम से जाना जाता है। मुख्यतः इस पर्व को यहाँ के बच्चों द्वारा मनाया जाता है। जिसमें छोटे-छोटे बच्चे गांव के हर घर की दहलीज पर जाकर फूल बिखेरते हैं।फूलदेई पर्व पर बच्चे सुबह ही उठकर स्नान करके पास के जंगल जाकर ताजे-ताजे फूल तोड़कर लाते हैं।

जरूर पढ़ें ; खेती बाड़ी की सौंधी महक ने साहित्य को महकाकर बुलंदी तक पहुंचाया उपासना सेमवाल को …!

जिनमें बुरांश, प्योंली, बासिंग, भिटौर आदि के सुन्दर पुष्प होते हैं। इन्हें बच्चे रिंगाल की छोटी टोकरियों में सजाते हैं और फिर नए कपड़े धारण कर घर-घर जाते हैं और लोगों के घरों की देहरी पर फूल बिखेरते हुए यह कहते हैं -”
फूलदेई
छम्मा देई, छम्मा देई,दैणी द्वार, भर भकार,
यो देई सौं,
बारम्बार नमस्कार।
फूलदेई, फूलदेई। ”

सर्दी और गर्मी के बीच का खूबसूरत मौसम, फ्यूंली, बुरांश और बासिंग के पीले, लाल, सफेद फूल और बच्चों के खिले हुए चेहरे… ‘फूलदेई’ से यही तस्वीरें सबसे पहले ज़ेहन में आती हैं। उत्तराखंड के पहाड़ों का लोक पर्व है फूलदेई। नए साल का, नई ऋतुओं का, नए फूलों के आने का संदेश लाने वाला ये त्योहार आज उत्तराखंड के गांवों और कस्बों में मनाया जा रहा है।फूलदेई त्यौहार को लेकर कई लोक कथाएं प्रचलित हैं। इस पर्व को गढ़-रत्न नरेंद्र सिंह नेगी ने अपनी कलम से लिखा और परदेश में रह रहे विवाहित नव दंपत्ति की कहानी बना डाली। कैसे बसंत ऋतू के आगमन पर उसका हृदय अपने पहाड़ की ओर लौट जाता है,वहां उसका मन अब लग नहीं रहा है अपने प्रियतम से गाँव छोड आने की बात कर रही है कि तुम्हें रहना है तो रहो! पर मुझे अपने गाँव छोड़ के आ जाओ यहाँ मेरा दम घुटता है। यहाँ का मुझे कुछ भी पसंद नहीं न यहाँ के लोग न यहाँ का रहन- सहन। गाँव में तो आजकल फुलारी का त्यौहार आ गया है खेतों में फ्योंली फूल गई होगी।

जरूर पढ़ें : आप भी देखें भोले बाबा के भजन नाची गैना मेरा भोले बाबा पर झूमता है पूरा उत्तराखण्ड -1 मिलियन लिस्ट में शामिल

इस पारम्परिक लोकपर्व गीत के वीडियो को पांडवाज बंधुओं ने रिक्रिएट किया और इस पर्व को देश विदेशों तक पहुँचाया है। फुलारी नाम से इसे पांडवाज के यूट्यूब चैनल पर रिलीज़ किया और अब तक ये वीडियो 2.3 मिलियन व्यूज पा चुका है। युवा गायक कवीन्द्र सिंह नेगी ने इसे बहुत ही शानदार ढंग से गाया जिससे एक बार फिर ये गीत श्रोताओं की जुबां पर लौट आया। कविंद्र के साथ युवा गायिका अंजलि खरे की आवाज आपको सुनाई देगी जो शकुना ,स्याली शंकरा जैसे गीतों में अपनी आवाज दे चुकी हैं
वीडियो की कहानी में कोई खास परिवर्तन नहीं किया गया है ,इसमें कविंद्र मुख्य भूमिका में रहे और दिल्ली से उत्तराखण्ड का पूरा सफर आपको करा दिया,लेकिन जब वो अपने गाँव पहुंचे तो मायुस हो गए। जिन अरमानों के संग गाँव के लिए निकले थे वो धरे के धरे रह गए अपने गाँव में देखा तो पाया अधिकांश घरों में तो ताले जड़े हुए हैं,जिन्हें देखकर फुलारी भी मायूस हैं जिन देहरियों पर हम फूल डाल रहे हैं उनमें रहने वाले तो कहीं और ही बस गए हैं।

उत्तराखंड में रिक्रिएशन का दौर जारी रिलीज़ हुआ कमान सिंह तोपवाल का गढ़वाली डीजे मैशअप

पांडवाज टीम ने इस लोकपर्व को दुनिया के सामने नए अंदाज में प्रस्तुत किया और उत्तराखण्ड में बढ़ते पलायन को भी वीडियो के माध्यम से दिखला दिया। इसे कहते हैं अपना पारम्परिक पर्व की झांकी भी दुनिया को दिखा दी और अंत में पलायन का सन्देश भी दे दिया। पांडवाज ब्रदर्स अपने कामों से ही पहचाने जाते हैं तीनों भाईयों की तिकड़ी ने वीडियो में अपनी कला का जौहर दिखाया है, संगीत में ईशान डोभाल, वीडियो निर्देशन में कुणाल डोभाल और सिनेमाटोग्राफी सलिल डोभाल की रही। कविंद्र के साथ अनूप डोबरियाल एवं क्रिएटिव एकडेमी रुद्रप्रयाग के प्रतिभावान विद्यार्थी फुलारी की भूमीका में रहे।

जरूर पढ़ें : बामणी 2 गीत की रचना का क्या था उद्देश्य जानना जरुरी है – देखें पलायन पर कटाक्ष – गीत के माध्यम से

अपने पाठकों के लिए फूलदेई त्यौहार से जुडी लोककथा का एक अंश भी शामिल कर रहे हैं जो उम्मीद ही नहीं आशा करते हैं पसंद जरूर आएगा। फूलदेई त्हयौर में द्वारपूजा के लिए एक जंगली फूल का इस्तेमाल होता है, जिसे फ्यूली कहते हैं। इस फूल और फूलदेई के त्यौहार को लेकर उत्तराखंड में कई लोक कथाएं मशहूर हैं।

एक वनकन्या थी, जिसका नाम था फ्यूंली। फ्यूली जंगल में रहती थी। जंगल के पेड़ पौधे और जानवर ही उसका परिवार भी थे और दोस्त भी। फ्यूंली की वजह से जंगल और पहाड़ों में हरियाली थी, खुशहाली। एक दिन दूर देश का एक राजकुमार जंगल में आया। फ्यूंली को राजकुमार से प्रेम हो गया। राजकुमार के कहने पर फ्यूंली ने उससे शादी कर ली और पहाड़ों को छोड़कर उसके साथ महल चली गई। फ्यूंली के जाते ही पेड़-पौधे मुरझाने लगे, नदियां सूखने लगीं और पहाड़ बरबाद होने लगे। उधर महल में फ्यूंली ख़ुद बहुत बीमार रहने लगी। उसने राजकुमार से उसे वापस पहाड़ छोड़ देने की विनती की, लेकिन राजकुमार उसे छोड़ने को तैयार नहीं था…और एक दिन फ्यूंली मर गई। मरते-मरते उसने राजकुमार से गुज़ारिश की, कि उसका शव पहाड़ में ही कहीं दफना दे। फ्यूंली का शरीर राजकुमार ने पहाड़ की उसी चोटी पर जाकर दफनाया जहां से वो उसे लेकर आया था। जिस जगह पर फ्यूंली को दफनाया गया, कुछ महीनों बाद वहां एक फूल खिला, जिसे फ्यूंली नाम दिया गया। इस फूल के खिलते ही पहाड़ फिर हरे होने लगे, नदियों में पानी फिर लबालब भर गया, पहाड़ की खुशहाली फ्यूंली के फूल के रूप में लौट आई। इतना महत्व है फूलदेई पर्व का उत्तराखण्ड में।

“आंदि जांदी सांस ” एक गीत नहीं उत्तराखंड प्रवासियों को सन्देश

हिल्लीवुड न्यूज़ की तरफ से उत्तराखण्ड की संभ्रांत जनता को फूलदेई पर्व की दिल्ली शुभकामनाऐं। लीजिए आप भी आज के दिन इस पर्व को जरूर याद करें देखिए ये वीडियो। और अपने उत्तराखण्ड की धरोहरों को संजोने में अपना योगदान दें :

HILLYWOOD NEWS
RAKESH DHIRWAN

Facebook Comments