उत्तराखंड में जैविक खेती के लिए एक्ट हुआ पारित, किसानों को मिलेगा फायदा

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Uttarakhand Agriculture

उत्तराखंड कृषि के क्षेत्र में हमेशा आगे रहा है उत्तराखंड के परम्परागत अनाज ना सिर्फ भारत बल्कि देश विदेशो में भी जाने जाते है। कुछ समय से सरकार भी उत्तराखंड के परम्परागत अनाजो को बचाने के लिए हर ठोस कदम उठा रही है, और अब सरकार ने परम्परागत व जैविक कृषि के बचाव के लिए एक्ट पारित किया है। एक्ट के मुताबिक कई एकड़ जमीनों में जैविक खेती की जाएगी।

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अभी परंपरागत कृषि में दो लाख एकड़ भूमि में उत्तराखंड में जैविक कृषि की जा रही है अब उत्तराखंड में जैविक खेती के लिए अलग से एक्ट पारित हो चुका है. इससे किसानों को उनके जैविक उत्पादों की कीमत भी मिलेगी तो साथ ही उत्तराखंड के जैविक उत्पादों को ब्रांड नाम भी मिलेगा. अभी उत्तराखंड में करीब 500 क्लस्टर हैं जिनमें पचास हज़ार किसान जैविक खेती से जुड़े हैं जो एक लाख अस्सी हज़ार क्विंटल जैविक कृषि उत्पादों का उत्पादन कर्ता है. इनमें गहत, मंडुआ, मक्का, सरसों, भट्ट, राजमा, गेहूं, चावल, मसाले व सब्जी मुख्य हैं. जैविक उत्पादन परिषद के समूहों के साथ अल्मोड़ा, पिथौरागढ़, बागेश्वर, चम्पावत, नैनीताल, पौड़ी, चमोली टेहरी, उत्तरकाशी व देहरादून में जैविक खेती की जा रही है. ऐसे प्रावधान भी संभव हैं की बंजर व अनुपयुक्त पड़ी कृषि भूमि को भूमि-स्वामी लीज पर दे सके. इस विधेयक के द्वारा उत्तराखंड में जैविक खेती के न्यूनतम समर्थन मूल्य को भी तय किया जाना है. दूसरी ओर मंडी परिषद जैविक उत्पादों को खरीदने के लिए रिवाल विंग फण्ड भी स्थापित करेंगी. इस विधेयक से जैविक पदार्थो का क्रय-विक्रय तो होगा ही साथ में प्रोसेसिंग करने वाली एजेंसी पर भी निगरानी रखी जानी संभव होगी. इनमें एनजीओ भी शामिल किये जायेंगे. यह संकेत भी दिये गए हैं कि जैविक उत्पाद के उत्पादक किसानों व संग्रहकर्ताओं से लागत व कीमत के पक्षों में की जा रही किसी भी प्रकार की बेईमानी व धोखाधड़ी पर कार्यवाही कर सजा और जुर्माने का भी प्रावधान होगा.

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जैविक खेती को सबल आधार देने के लिए उत्तराखंड में अधिसूचित क्षेत्र के दस विकास खण्डों में रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकोंको प्रतिबंधित व पशु चिकित्सा में प्रयुक्त दवाओं के साथ पशु चारे की बिक्री को विनियमित किया जाएगा. पशु आधारित खेती से ही जैविक कृषि संभव है. पहाड़ के किसान दूध-दन्याली के लिए पशुपालन करते रहे हैं. जैविक कृषि विधेयक के पहले क्रम में चिन्हित ब्लॉकों में रासायनिक खाद व खेती में प्रयोग होने वाले अन्य रासायनिक पदार्थ भी प्रयोग में नहीं लाये जायेंगे. अगर अधिसूचित क्षेत्र में प्रतिबंधित पदार्थों की बिक्री होती है तो कानूनी कार्यवाही होगी. जिसमें एक लाख का जुर्माना व साल भर की कैद भी हो सकती है. जैविक खेती खेतिहरों को बीज, प्रशिक्षण, बिक्री की साथ प्रमापीकरण की सुविधा भी प्रदान करेंगी. अभी जो भी किसान जैविक खेती कर रहे हैं, उन्हें इन पदार्थों की वाजिब कीमत नहीं मिलती. बाजार में मार्केटिंग का मायाजाल है जो शुद्ध व जैविक के नाम पर मोटा मुनाफा वसूल करते रहे हैं. साथ ही नकली व मिलावट वाले पदार्थ बेच उपभोक्ता के साथ भी ठगी करते हैं.

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बागवानी को सुरक्षित रखने के लिए भी प्राविधान हैं। अब सरकारी नर्सरी को नर्सरी एक्ट में रख दिया गया है।यदि यह गुणवत्ता के मानकों पर खरी नहीं उतरती तब पचास हज़ार रुपये का जुर्माना नर्सरी को देना होगा।अभी अधिकांश पौंध राज्य से बाहर से आती है अब इनकी गुणवत्ता की बिक्री के लिए कड़े नियम बनेंगे। नयी पौध नरसरी खोलने के प्राविधान भी होंगे. पौध गुणवत्ता के लिए संचालक जिम्मेदार होगा।नये फलदार पौंधों को पेटेंट भी कराया जाएगा। ऐसे में उत्तराखंड के दस विकास खण्डों से की जा रही यह पहल उन वनवासियों व अनुसूचित जनजातियों के समग्र लोकज्ञान व लोक वनस्पति पर गहरी समझ को पुनर्जीवित करने में उत्प्रेरक का काम करेंगी जो मध्यवर्ती तकनीक से बेहतर और कारगर उत्पादन का हुनर जानते थे। यह सचाई भुला दी गयी कि किसान ही अपने खेत खलिहान का वैज्ञानिक है। वह जानता है कि उसे अपने खेत में क्या इस्तेमाल करना है और अपने अनुभवों से वह यह भी सीख गया है कि कुछ अधिक उगा लेने के फेर में उसकी कैसी दुर्गति हुई है। किसान को वाजिब कीमत मिलने वाला बाजार मिल जाये तो जैविक उत्पाद व जंगलों में पायी जाने वाली वनौषधियों, भेषजों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सबल आधार मिल सकता है।

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