पानी के अंदर आज भी जिंदा है ये शहर, दिखते हैं अवशेष।

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पहाड़ों की खूबसूरत वादियों में स्थित टिहरी गढ़वाल जो पर्याटक स्थान के रूप में जाना जाता है, प्रति वर्ष बड़ी संख्या में पर्यटक यहां पर घूमने के लिए आते हैं, यहां की प्राकृतिक खूबसूरती काफी संख्या में पर्यटकों को अपनी ओर खींचती है, लेकिन उससे भी ज्यादा खास है यहां स्थित टिहरी डैम जो इसे विश्व स्तर तक पहचान दिलाती है, जिसके बारे आज हम इस लेख में बात करने वाले हैं.

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समुंद्रतल से 1750  मीटर की ऊंचाई पर स्थित टिहरी गढ़वाल प्रसिद्ध राज्य उत्तराखंड का एक पर्वतीय जिला है,टिहरी रियासत के तत्कालीन महाराजा सुदर्शन शाह ने 30 दिसंबर 1815 को टिहरी नगर की नींव रखी थी, टिहरी को गणेश प्रयाग और धनुष तीर्थ के नाम से भी जाना जाता है, ऐसा माना जाता है कि टिहरी शब्द की उत्पत्ति त्रिहरि शब्द से हुई है, त्रिहरि का अर्थ तीन जल या त्रिवेणी से माना जाता है, यहां पर भागीरथी भिलंगना के अलावा पातालगंगा का भी संगम है, पुराणों में मनसा, वाचा, कर्मणा रूपी तीनों पापों से मुक्ति का स्थल माना जाता है, भागीरथी एवं भिलंगना के संगम पर टीरी या टिपरी नामक स्थान पर पंवार वंश के 55वें शासक सुदर्शन शाह ने राजधानी बनाई थी, जोकि 29 अक्टूबर 2005 को टिहरी हमेशा के लिए झील में विलीन होकर इतिहास बना गया,42 वर्ग किलोमीटर में फैली झील से झांकते पुरानी टिहरी के अवशेष अब भी पुरानी दास्तां बयां करते हैं.

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उत्तराखंड राज्य के टिहरी जिले में स्थित टिहरी बाँध हिमालय पर्वतो के बीच दो नदियों भागीरथी और भिलंगना के संगम पर बना हुआ है, टिहरी बाँध कार्य के समय जब बाँध में पानी अधिक मात्रा में इकठ्ठा होने लगा, तब टिहरी शहर पानी में डूब गया था, टिहरी बाँध को सुमन सागर के नाम से भी जाना जाता है, पुराने टिहरी विस्थापित कर बाद में नया टिहरी शहर बसाया गया है,सन1978 में 600 मेगा वाट का बिजली संयंत्र लगाकर टिहरी बांध का निर्माण शुरू किया गया था, लेकिन आर्थिक और पर्यावरणीय समस्याओं चलते-चलते इसका निर्माण 2006 में पूरा हुआ था, जो की भारत का सबसे ऊँचा बाँध है, और विश्व के सबसे बड़े पांच बांधो में शामिल है, जिसका उपयोग सिंचाई और बिजली पैदा करने के लिए किया जाता है, जिसकी उत्पादित बिजली उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, दिल्ली, हरियाणा, जम्मू और कश्मीर, चंडीगढ़, राजस्थान और हिमाचल प्रदेश को आपूर्ति की जाती है.

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इस बांध के निर्माण के दौरान हजारों लोग बेघर हुए थे, हजारों लोगों को अपना गांव और घर छोड़ना पड़ा था, करीब 125 गांव पर इस बांध का असर पड़ा था , 27 गांव इसमें पूरी तरह से डूबे गए थे, और 88 गांव आंशिक रूप से प्रभावित हुए थे, वैज्ञानिकों के अनुसार खूबसूरत झील के लिए पहचान रखने वाला यह बांध अगर टूटता है, तो करीब 22 मिनट के अंदर ऋषिकेश हरिद्वार डूब जाएगा वहीं यूपी के कुछ शहरों के साथ साथ पश्चिम बंगाल तक इसके असर देखने को मिलेंगे.

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