कुमाऊं में मनाया जाता है पहाड़ का पारम्परिक त्यौहार “दूतिया”

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कुमाऊं में मनाया जाता है पहाड़ का पारम्परिक त्यौहार “दूतिया”

दीपावली एक ऐसा त्यौहार है जिसे पूरे देश भर में हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता हैं।जब बात त्यौहारो की आती है तो हमारे उत्तराखंड में हर त्यौहार को मनाने का अंदाज़ थोड़ा अलग है।यहां पर विभिन्न तरीकों से त्यौहारो को मनाया जाता है,एक ऐसा ही त्यौहार जिसे भारतवर्ष में भाईदूज के नाम से मनाया जाता है जबकि उत्तराखंड के कुमाऊं में भाईदूज का त्यौहार नही बल्कि दूतिया त्यौहार मनाने की मान्यता है।

Kumaon Traditional Festival “Dootiya”

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कुमाऊँ में भैय्यादूज मनाया ही नहीं जाता है।यहां पर भाईदूज का दूसरा ही रूप है, लेकिन भैय्यादूज कब यहॉ की लोक संस्कृति में घुस गया किसी को पता ही नहीं चला ।

कुमाऊं में भैय्यादूज की जगह दूतिया त्यौहार मनाने की लोक परम्परा रही है। इसे मनाने की तैयारी कुछ दिन पहले से शुरू हो जाती है।कहीं एकादशी के दिन, कहीं धनतेरस के दिन और कहीं दीपावली के दिन शाम को एक बर्तन में धान को पानी में भिगाने के लिए डाल दिए जाते हैं और गौवर्धन पूजा के दिन इन धान को पानी में से निकाल कर कपड़े में बांध कर रख दिये जाते है ताकि उसका सारा पानी निकल जाए ।उसके दो-एक घंटे बाद उस धान को कढ़ाई में भून लिया जाता है। उसके बाद उसे गर्मा-गर्म ही ओखल में मूसल से कूटा जाता है। गर्म होने के कारण चावल का आकार चपटा हो जाता है और उसका भूसा भी निकल कर अलग हो जाता है।इन हल्के भूने हुए चपटे चावलों को ही “च्यूड़े” कहा जाता है।

Kumaon Traditional Festival “Dootiya”

जिस बर्तन में च्यूड़े रखे जाते हैं, उसमें थोड़ा कच्ची हल्दी को कूट कर और हरी दूब के एक गुच्छे को सरसों के तेल से भरे कटोरे के साथ सबसे ऊपर रखा जाता है।इन च्युडो को पूजा में चढ़ाने के साथ ही खाने के लिए भी बनाया जाता हैं। च्यूड़ों को अखरोट, भूने हुए भांग के साथ खाया जाता है ।च्यूड़े बनाने से पहले दीपावली के दिन ओखल के चारों से गेरू से लिपाई की जाती है और शाम को ओखल में फूल चढ़ाकर उस पर एक दीया भी रखा जाता है।

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गोवर्धन पूजा के दिन भी च्यूड़े बनाने से पहले ओखल की धूप जलाकर पूजा की जाती है, उसके बाद ही च्यूड़े बनाने का कार्य किया जाता है।ओखल की पूजा का मतलब है कि उससे कूटा हुआ स्वादिष्ट अनाज पूरे परिवार को साल भर खाने को मिले और परिवार में किसी को भी कभी भूखे पेट न सोना पड़े।

Kumaon Traditional Festival “Dootiya”

दीपावली के तीसरे दिन “दूतिया का त्यौहार” कुमाऊँ में मनाया जाता है।पहले दिन तैयार च्यूड़े सिर में चढ़ाए जाते हैं।सवेरे पूजा इत्यादि के बाद घर की सबसे बड़ी महिला च्यूड़ों को सबसे पहले देवतों को चढ़ाती हैं और उसके बाद परिवार के हर सदस्य के सिर में चढ़ाती है।च्यूढ़े चढ़ाने से पहले अक्षत व टीका लगाया जाता है।उसके बाद पहले दिन च्यूड़े बनाने के बाद एक कटोरे में सरसों के तेल के साथ रखे गए दूब के गुच्छे को दो हिस्सों में बांट लिया जाता है।दूब के दोनों गुच्छों को दोनों हाथ में लेकर उनसे सिर में सरसों का तेल लगाया जाता है। सिर में तेल तब तक लगाया जाता है जब तक वो सिर से बहन न शुरू हो जाए और उस बहते हुए तेज को “दूतिया की धार” कहा जाता है। इसके बाद दोनों हाथों में च्यूढ़े लेकर जमीन में बैठे व्यक्ति के पहले पैरों, उसके बाद घुटनों, फिर कंधों और अंत में सिर में च्यूढ़े चढ़ाए जाते हैं और ऐसा तीन या पांचबार किया जाता है
च्यूढ़े परिवार के सदस्यों के अलावा गाय व बैल के सिरों में भी चढ़ाये जाते हैं । च्यूढ़े चढ़ाने से पहले उनके सींग में सरसों का तेल चुपड़ा जाता है।गले में फूलों की माला पहनाई जाती है। उसके बाद गाय व बैल के माथे पर भी टीका लगाया जाता है और फिर सिर में च्यूढ़े चढ़ाए जाते हैं। यह बताता है कि हमारे लोक की परम्परा में पालतू जानवरों को भी एक मुनष्य की तरह का दर्जा दिया जाता रहा है, क्योंकि लोकजीवन पालतू जानवरों (गाय, बैल) के बिना अधूरा है ।

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इस त्यौहार को हमेशा से हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है किंतु कुछ समय से ऐसे त्यौहार गुम से होने लगे है।इस त्यौहार के विषय मे भी बहुत ही कम लोग जानते है और इसका एक कारण हम ही है क्योंकि हम लोग अपनी संस्कृति को भुलाकर बाहरी संस्कृति को शिघ्र अपना लेते है और इस वजह से हमारी संस्कृति हमारे रीति रिवाज खो जाते है।अगर ऐसा ही होता रहा तो आने वाली पीढ़ी तक हमारी किसी भी संस्कृति का पहुँच पाना असंभव है।अतः इस बार भाईदूज के साथ साथ “दूतिया त्यौहार”भी जरूर मनाये और अपनी संस्कृति को जीवित रखने में सहयोग करे।

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