भारतीय सेना की सबसे ताकतवर सेना बल गढ़वाल राइफल की गौरव गाथा

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भारतीय सेना की सबसे ताकतवर सेना बल गढ़वाल राइफल की गौरव गाथा

देवभूमि जो अपने प्राकृतिक सौंदर्य वा प्रसिद्ध धार्मिक पर्याटनों के लिए विश्व तक जानी जाती है इसी के साथ उत्तराखंड को वीर जवानों की भूमि भी कहा जाता है, जो माटी कई वीर गथाओं और शहादत के लिए भी जानी जाती है, भारत का इतिहास उत्तराखंड के वीरों के अनुपम शौर्य एंव गौरव शाली सैनिकों के बलिदान से भरा पड़ा है, विपरित परिस्थितियों में संघर्ष करने की शक्ति गढ़वालियों की विशेषता रही है, और अपने इस पोस्ट में हम आपको गढ़वाल राइफल की इसी वीरता से रूबरू करवाएंगे.

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बढ़े चलो गढ़वालियों बढ़े चलो

दिल में जिगर आंख में काल चाहिए

तलवार चाहिए ना कोई ढाल चाहिए

गढ़वालियों के खून में उबाल चाहिए

इसी नारे के साथ देश की रक्षा करते यह सैनिक जिन्हें गढ़वाल राइफल कहा जाता है, अपने इस पोस्ट में आज हम हिमालय के ऊंचे पहाड़ों से आते इन जवानों की वीरता वा गढ़वाल राइफल के इतिहास की बात करेंगे.

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गढ़वाल रेजीमेंट की स्थापना 1887 में हुई, गढ़वाल रेजीमेंट की स्थापना के पीछे बलभद्र सिंह नेगी का नाम विशेष उल्लेखनीय है, जिन्होंने सन् 1879 में कंधार के युद्ध में अफगानों के विरुद्ध अपनी अद्भुत हिम्मत, वीरता और लड़ाकू क्षमता के फलस्वरूप ‘आर्डर ऑफ मैरिट’, ‘आर्डर ऑफ ब्रिटिश इण्डिया’, ‘सरदार बहादुर’ आदि कई सम्मान पदक प्राप्त करे। उस समय दूरदृष्टि रखने वाले पारखी अंग्रेज शासक गढ़वालियों की वीरता और युद्ध कौशल का रूझान देख चुके थे, तब तक बलभद्र सिंह नेगी प्रगति करते हुए जंगी लाट का अंगरक्षक बन गए थे, माना जाता है कि बलभद्र सिंह नेगी ने ही जंगी लाट से अलग गढ़वाली बटालियन बनाने की सिफारिश की, लम्बी बातचीत के उपरान्त लार्ड राबर्ट्सन ने 4 नवम्बर 1887 को गढ़वाल ‘कालौडांडा’ में गढ़वाल पल्टन का शुभारम्भ किया, कुछ वर्षों पश्चात् कालौडांडा का नाम उस वक्त के वाइसराय लैन्सडाउन के नाम पर ‘लैन्सडाउन‘ पड़ा, जो आज भी गढवाल रेजिमेंटल सेंटर है.

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बता दें कि गढ़वाल राइफल्स (garhwal rifles) भारतीय सेना का एक सैन्य दल है, 1891 में 2-3 गोरखा रेजीमेंट की दो कंपनियों से एक गोरखा पलटन 2-3 क्वीन अलेक्टजेन्टास आन (बटालियन का नाम) खड़ी की गई और शेष बटालियन को दोबारा नए बंगाल इन्फैंट्री की 39वीं गढ़वाल रेजीमेंट के नाम से जाना गया, बैज से गोरखाओं की खुखरी हटाकर उसका स्थान फोनिक्स बाज को दिया गया, इसने गढ़वाल राइफल्स को अलग रेजीमेंट की पहचान दी, 1891 में फोनिक्स का स्थान माल्टीज क्रास ने लिया, इस पर द गढ़वाल राइफल्स रेजीमेंट अंकित था, बैज के ऊपर पंख फैलाए बाज थे, यह पक्षी शुभ माना जाता था, इससे गढ़वालियों की सेना में अपनी पहचान का शुभारंभ हुआ.

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उत्तराखंड में स्थित गढ़वाल राइफल्स रेजिमेंट सेंट रेजिमेंट का युद्ध नारा है ‘बद्री विशाल लाल की जय भगवान बद्री नाथ के पुत्रों की विजय गढ़वालियों की युद्ध क्षमता की असल परीक्षा प्रथम विश्व युद्ध में हुई, जब गढ़वाली ब्रिगेड ने ‘न्यू शेपल’ पर बहुत विपरीत परिस्थितियों में हमला कर जर्मन सैनिकों को खदेड़ दिया था, 10 मार्च 1915 के इस घमासान युद्ध में सिपाही गब्बर सिंह नेगी ने अकेले ही युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाई थी, उन्होंने कई जर्मन सैनिकों का सफाया कर खुद भी वीरगति को प्राप्त हुए थे.उसके बाद द्वितीय विश्व युद्ध 1939 से 45 के बीच में गढ़वाल राइफल्स ने अपनी अहम भूमिका निभाई, ऐसे ही 1962 का भारत-चीन युद्ध, 1965 और 1971 का भारत-पाक युद्ध, शांति सेना द्वारा ऑपरेशन पवन (1987-88 ) उसके बाद 1999 में पाकिस्तान के साथ कारगिल युद्ध गढ़वाल राइफल्स के जवानों ने अपनी वीरता से दुश्मनों के छक्के छुड़ा दिए थे.

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रेजिमेंट ने युद्ध और शांति दोनों में अपनी अलग पहचान बनाई है, पर्वतारोहण, संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों और आपदा के समय में नागरिक आबादी को सहायता प्रदान करने में इसके कारनामों ने गढ़वाल, उत्तराखंड और राष्ट्र के लोगों के दिल और दिमाग में अपना गौरवपूर्ण स्थान सुनिश्चित किया है,  ना केवल भारत ही नहीं गढ़वाल राइफल्स ने एशिया, यूरोप और अफ्रीका में भी शौर्य की पताका फहराई है यह रेजिमेंट भारतीय सेना की सबसे ज्यादा वीरता पुरस्कार पाने वाली रेजिमेंट है, आज, गढ़वाल राइफल्स भारतीय सेना की सबसे बड़ी और सबसे सुशोभित पैदल सेना रेजिमेंटों में से एक है, जो गर्व से 40 थिएटर और बैटल ऑनर्स से सम्मानित है, जो “बड़े चलो गढ़वालियो, बड़े चलो” की धुन पर आगे बढ़ती है, इसका युद्ध घोष है: बद्री विशाल लाल की जय! जब भी राष्ट्र कार्रवाई के लिए कहता है तो गूंज उठता है.

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