100 साल पुराने खंडहर का इस कदर बदला हाल, जिसे देखने उमड़ी भीड़

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100 साल पुराने खंडहर का इस कदर बदला हाल, जिसे देखने उमड़ी भीड़

उत्तराखंड के लोगों के मुताबिक पर्वतीय राज्यों से पलायन यहां की सबसी बड़ी और अहम समस्या है, जिसके हल ढूंढने की बजाए लोगों को सरकारों पर पूरा ठिकरा डालने की आदत सी हो गई है, लेकिन क्या आपने सोचा इसका हल हम खुद हैं जिस दिन पहाड़ को लेकर हमारी सोच बदल जाएगी उसी दिन इसका हल भी वो जाएगा, जिसका जीता जागता उदाहरण उत्तराखंड के संदीप रावत बने जिन्होंने पहाड़ में वापसी हेतु ऐसा कदम उठाया जिससे आज हर उत्तराखंड के दिलों में एक उम्मीद जाग गई है.

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हम पहाड़ी अपने उत्तराखंड में बहुत कुछ कर सकते हैं, लेकिन उसके लिए सबसे जरूरी है एकजुटता की, जिस दिन उत्तराखंडी ये सोचने लग जाएं की हम एक होकर अपने पहाड़ में वापसी कर वहीं कुछ करेंगे वहां की सुविधाओं को ठीक करेंगे, बस उसी दिन पलायन की यह समस्या भी खत्म हो जाएगा, लेकिन सबसे पहले हमें खुद की सोच बदलनी होगी, ठीक उसी तरह जिस तरह माणा गांव को हम भारत का आखिरी गांव कहते थे, लेकिन बदलती सोच के बाद आज उसे भारत का पहला गांव घोषित कर दिया गया है, उसी तरह उत्तराखंड के लोगों को भी इस बात को सोचना होगा कि पहाड़ में जमीन बेचने के बजाय अगर आप अपने घर के रुप रंग को बदल दें तो आपका रहना भी हो जाएगा, जमीन भी रहेगी और आपकी कमाई भी होगी.

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बता दें लैंसडाउन के संदीप रावत इससे पहले रोजगार के लिए बाहर नौकरी करते थे, लेकिन कुछ समय वहां बीताने के बाद उनके मन में ख्याल आया कि बाहर काम करने से अच्छा अपने ही पहाड़ में रहकर कुछ किया जाए, इसी सोच के साथ उन्होंने Heritage Home Stay बनाने का कार्य किया जिसमें उन्होंने 100 साल पुराने घर की इस कदर काया बदली की आज लोग भागे दौड़े सिर्फ इसे देखने आ रहे हैं, उन्होंने इस पुराने बदहाल घर को एक बेहतरीन होम स्टे में बदला है जिसकी सुंदरता देखने से ही बनती है, जो उत्तराखंड के विलुप्त होती विरासत को दर्शता है, उनके इस हॉम स्टे की सबसे खास यह है कि सालों पुराने घर को संदीप ने ना केवल तोड़ने से बचाया बल्कि बिन तोड़े इसे नया रूप रंग दिया है जिसकी तस्वीर अब पूरे उत्तराखंड में वायरल हो रही है.

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संदीप को इस कार्य में 1 डेढ़ साल का समय जरूर लगा, लेकिन अपनी इस मेहनत को सफल फल उन्हें मिल गया है, भारी संख्या में लोग यहां पहुंच रहे हैं, और उनको बधाई दे रहे हैं, संदीप का यह कार्य सभी उत्तराखंडियों के लिए बेहतरीन उदाहरण है, जो दिखाता है कि पहाड़ में पुराने भवनों को कैसे संरक्षित करने के साथ-साथ व्यवहारिक बनाया जा सकता है,आज हमें ऐसी संरचनाओं को बचाने की जरूरत हैं, जो शहरी परिदृश्य में गायब हो रही है, जिसके चलते यहां पलायन का आंकड़ा बढ़ता जा रहा है.

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