उत्तराखंड फिल्म जगत के पितामह कहे जाने वाले पराशर गौड़

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Parashar Gaur the father of Uttarakhand film industry

पराशर गौड़ की जीवनी (The Biography of Parashar Gaur)

पाराशर गौड़ उत्तराखंड फिल्म उद्योग के एक जाने माने चेहरे हैं या यूँ कहे कि वह उत्तराखंड फिल्म उद्योग के जन्मदाता हैं और इस बात में कोई अतिश्योक्ति नहीं हैं कि उन्हें उत्तराखंड फिल्म जगत का गॉड फादर भी कहा जाता हैं।
वह पहली गढ़वाली फिल्म Jaggwal “जग्वाल” के निर्माता भी हैं। जिसे उन्होंने सन 1983 में प्रोडूस किया जोकि उस समय की चर्चित फिल्मो में से एक है। फिल्म जग्वाल से पहले शायद ही किसी को गढ़वाली बोली के बारे में कुछ पता हो। उनकी चिंता का विष्य यह था कि गढ़वाली भाषा अपने आप में कही लुप्त होती जा रही हैं उसको संजोय के रखना हम सब कि जिम्मेदारी हैं और उसकी शुरुवात हमें स्वयं करनी चाहिए अपने घर से अपनी आने वाली पीढ़ी को गढ़वाली भाषा सीखा के।

उन्होंने गढ़वाली संस्कृति और परंपरा को उत्तराखंड फिल्म जगत में एक नयी पहचान दिलवाई हैं। एक बात जो वह हमेशा कहा करते हैं कि “राजनीती तोड़ती हैं , संस्कृति जोड़ती हैं”।

About Parashar Gaur:

पाराशर गौड़ का जन्म 3 मई 1947 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में पट्टी असवाल स्यूं के ग्राम मिर्चोड़ा में हुआ था। वह अपने पिता स्वर्गीय पंडित टीकाराम गौड़ व माता स्वर्गीय मथुरा देवी की पांचवी संतान हैं। उनके पिता दिल्ली में एक जाने माने ज्योतिषी थे। सन 1989 को वह कनाडा शिफ्ट हो गए थे और तब से वे कनाडा टोरंटो में ही रहते हैं।

Parashar Gaur with Prime Minister Indira Gandhi
Parashar Gaur with Prime Minister Indira Gandhi

शिक्षा :-(Education of Parashar Gaur)

उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा अपने क्षेत्र के स्कूल से की जबकि आठवीं उत्तीर्ण करने के पश्च्यात दिल्ली में कार्यरत उनके पिता जी ने उन्हें आगे की शिक्षा के लिए दिल्ली बुला लिया था। परन्तु दिल्ली में पारवारिक प्रस्थियों के चलते उन्हें अपनी रेगुलर कक्षाओं को छोड़कर उन्हें रात्रि में प्राइवेट कक्षाएं करनी पड़ी। बारहवीं करने के बाद उन्होंने बी ए प्राइवेट में दाखिला लेकर अपनी आजीविका के साथ साथ अपनी आगे की पढाई को भी जारी रखा।

व्यवसाय :-(Occupation of Parashar Gaur)

उन्होंने अपने करियर की शुरुवात एक थिएटर पर्सन के रूप में की। उन्होंने 10 वर्ष की उम्र में उनके गांव द्वारा आयोजित नाटक “राजा हरीश चंद्र “ में बाल कलाकार “रोहताश ” का किरदार निभाया था और 20 वर्ष की उम्र में उन्होंने अपना पहला गढ़वाली फुल लंघत “औंसी की रात” नामक नाटक लिखा था ,जिसका मंचन पहली बार 28 फरवरी 1969 को थिएटर में “पुष्पांजलि रंगशाला” के बैनर तले किया गया था।
वह रंगमंच के जरिये लोगो को जागरूक करना चाहते थे।

उन्होंने गढ़वाली व हिन्दी थिएटर के लिए बतोर प्रोडूसर, डायरेक्टर व राइटर बीस साल से ज़्यादा समय तक काम किया। उन्होंने गढ़वाली व हिंदी के लगभग 50 से ज़्यादा नाटकों में काम किया।
वह उस समय के जाने माने गढ़वाली कलाकारों में से एक थे।
उन्होंने अपने करियर में 30 से ज़्यादा गीत लिखे जिन्हे आकाशवाणी दिल्ली ने 1970 में अपने रेडियो प्रोग्राम में प्रसारण किया। यही नहीं इसके इलावा उन्होंने 300 से अधिक गढ़वाली कवितायें व आर्टिकल लिखे जिनको कई वेबसाईट्स, न्यूज़ पेपर व मैगज़ीन ने प्रसारित किया।

उन्होंने उकाल उन्धार (UKAAL UNDHAAR)नामक एक किताब भी लिखी जो की गढ़वाली कविताओं का एक संग्रह हैं। उन्होंने अपनी इस किताब को 2006 में कनाडा से प्रकाशित किया था क्योंकि सन 1989 को वह कनाडा शिफ्ट हो गए थे, वर्तमान में वह कनाडा टोरंटो में ही रहते हैं।

टर्निंग पॉइंट:- (Turning Point in the life of Parashar Gaur)

नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा नई दिल्ली (NSD)में सिलेक्शन हो जाने के बावजूद उन्होंने वह न चुन के अपनी मिट्टी के लिए कुछ करने की ठानी। वह अपने लक्षय को ले के बिलकुल सटीक थे कि वह अपनी मात्र भाषा के लिए कुछ करना चाहते थे ताकि पुरे जगत में उनकी मात्र भाषा गढ़वाली का नाम हो। पर यह सफर उनके लिए इतना आसान नहीं था। पहले वह हिमांशु जोशी की कहानी “कगार की आग” पर चलचित्र बनाना चाहते थे पर किसी वजह से वह संभव नहीं हो पाया। तब उन्होंने स्वयं एक गढ़वाली कहानी लिखने का निश्चय किया। तब उन्होंने पहली गढ़वाली चलचित्र “जग्वाल” की कहानी लिखी। जो उस समय की सबसे प्रसिद्ध चलचित्र रही उसने उस समय काफी वाहवाही बटोरी। पर उन्हें यह कामयाबी इतनी आसानी से प्राप्त नहीं हुई थी। इसके लिए उन्हें बहुत संघर्ष करना पड़ा था।

Jaggwal the first Garhwali film
Jaggwal the first Garhwali film

जब लोगो को पता चला कि वह एक गढ़वाली फिल्म बनाने जा रहे हैं तो उन्होंने उनका बड़ा हास्य बनाया। उनके अपने मित्रों तथा जान पहचान वालो ने भी उनका साथ नहीं दिया। यहाँ तक कि उनके साथ काम करने वालो ने उनके साथ काम करने से भी मना कर दिया। इतने अच्छे और मंझे हुए कलाकार होने के बावज़ूद कोई उन्हें अपने नाटक में काम नहीं करने दे रहा था जिसकी वजह से कई नाटक के लेखक व नाटक करवाने वाली संस्थाए चाह कर भी उन्हें नहीं ले पा रही थी। सभी ने कहा यह क्या फिल्म बना पायेगा पर उन्होंने अपना इरादा और हौसला पक्का रखा अपने दिल की सुनी और अपने लक्षय की तरफ बढ़ते गए। सन 1983 में जब उनकी पहली गढ़वाली फिल्म “जग्वाल” रिलीज़ हुई तो उनकी तरफ देखने का लोगो का नज़रिया ही बदल गया।

उस फिल्म को लोगो ने इतना पसंद किया कि वह उस समय की सब से चर्चित फिल्म हुई और उस फिल्म के लिए उनको कई अवार्ड्स भी दिए गए। जो लोग यह कह रहे थे कि यह क्या फिल्म बनाएगा वही लोग उस फिल्म की सक्सेस के बाद उनकी प्रशंसा करते नहीं थक रहे थे।

उन्होंने अपनी कामयाबी का श्रेय उन्हीं लोगो को दिया जो उन्हें ताने मारा करते थे, उन्होंने कहा उनके तानो ने ही उनके अंदर की चिंगारी कि अपनी मातृ भाषा में एक फिल्म बनाऊंगा को बुझने नहीं दिया। यह कामयाबी उनकी ज़िन्दगी में एक नया मोड़ ले कर आयी। उन्हें उत्तराखंड का दादा साहिब फाल्के भी कहा जाने लगा।

अवार्ड्स एंड अचीवमेंट्स:- (Awards and Achievements of Parashar Gaur)

उन्हें गढ़वाली संस्कृति को बढ़ावा देने तथा गढ़वाली फिल्म जग्वाल बनाने के लिए UANA America और UCA Canada की तरफ से लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से नवाज़ा गया।उन्हें अपने कार्य के लिए और भी कई अवार्ड्स दिए गए जैसे कि गढ़वाली साहित्य पुरस्कार, नवानि साहित्य पुरुस्कार कानपुर
वह उत्तराखंड कल्चरल एसोसिएशन “UCA” के सदस्य भी हैं, उन्होंने बतौर प्रेजिडेंट एंड सेक्रेटरी 10 वर्षो तक वहा अपना योगदान भी दिया हैं।

उन्होंने जग्वाल के इलावा भी फिल्में लिखी जैसे की “ध्ये” ध्ये का मतलब आवाज़ (दूर से आवाज लगाकर किसी को पुकारना), जो की उनकी दूसरी फिल्म हैं। उन्होंने एक फिल्म पहाड़ी राजनीती पर आधारित व्यंग पर बनाई जिसका नाम हैं “गौरा” जो कि उत्तराखंड की पहली राजनैतिक फिल्म के रूप में प्रचलित हुई और इसे वोमेन फिल्म फेस्टिवल में शामिल भी किया गया। उन्होंने उत्तराखंड फिल्म जगत में 25 वर्ष जुड़े रहने की निमित्त में यह फिल्म “गौरा” बनाई थी जो कि एक शॉर्ट फिल्म हैं।

उनके द्वारा लिखी गयी 300 से अधिक कविताओं में से कुछ इस प्रकार हैं :- (Poems written by Parashar Gaur)

ख़ुशी, तीस, गुस्सा, सवाल, लीसा पेड़, मज़बूरी, उखेल, कैद, समस्या, पहाड़, सवीना, उपचार आदि। उनके द्वारा लिखी सभी कविताये क्रांतिकारी के रूप में प्रचलित हुई।

कुछ कविताओं के लिंक इस प्रकार हैं :-

दीप जलाने हो तो | दुबिधा | कुर्बानी | एक आम गुंडे का आत्मसम्मान | अभिनन्दन

Social Media & Interview of Parashar Gaur

Parashar Gaur with Udit Narayan

फेसबुक पेज | इंटरव्यू विथ पराशर गौड़