मशहूर हिंदी साहित्यकार और आलोचक नामवर सिंह का दिल्ली के एम्स अस्पताल में निधन

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namvar singh

हिंदी साहित्य में आलोचना विधा को नया रूप देने वाले साहित्यकार नामवर सिंह का 93 साल की उम्र में दिल्ली के एम्स अस्तपताल में मंगलवार को निधन हो गया। नामवर सिंह पिछले कई दिनों से अस्वस्थ चल रहे थे।28 जुलाई, 1926 को तत्कालीन बनारस जिले के जीयनपुर गांव में नामवर सिंह का जन्म हुआ था ,नामवर सिंह ने हिंदी और साहित्य में एम.ए और पीएचडी करने के बाद काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में पढ़ाया भी ,इसके बाद नामवर सिंह दिल्ली आ गए और यहाँ उन्होंने जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में भारतीय भाषा केंद्र की स्थापना की और हिंदी साहित्य को नई ऊंचाइयां दी।
नामवर सिंह के निधन के बाद वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने लिखा हिंदी में फिर सन्नाटे की खबर ,साहित्य पुरस्कार से सम्मानित डॉ नामवर सिंह ने हिंदी साहित्य जगत को अपना भरपूर योगदान दिया।

आइये जानते हैं कैसे शुरू हुआ था नामवर सिंह का साहित्यकार तक का सफर

नामवर सिंह ने अपने लेखन की शुरुआत कविता से की और 1941 में उनकी पहली कविता ‘क्षत्रियमित्र’ पत्रिका में छपी।
1951 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से एमए करने के दो साल बाद वहीं हिंदी के व्याख्याता नियुक्त हुए। 1959 में चकिया चंदौली से कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर लोकसभा चुनाव हारने बाद बीएचयू से अप्रिय परिस्थितियों में नौकरी छोड़नी पड़ी और उसके बाद सागर विश्वविद्यालय में कुछ दिन नौकरी की।

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1960 में बनारस लौट आए। फिर 1965 में जनयुग साप्ताहिक के संपादन का जिम्मा मिला। 1971 में नामवर सिंह को कविता के नए प्रतिमान पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। 1974 में दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर नियुक्त हुए और वहीं से 1987 में सेवा-मुक्त हुए।

नामवर सिंह एक प्रखर वक्ता भी थे। बकलम खुद, हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योगदान, आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियांष छायावाद, पृथ्वीराज रासो की भाषा, इतिहास और आलोचना, नई कहानी, कविता के नए प्रतिमान, दूसरी परंपरा की खोज उनकी प्रमुख कृतियां हैं।

लेखक नामवर सिंह के निधन पर साथी लेखकों, पत्रकारों और राजनेताओं ने गहरा दुख जताते हुए श्रद्धांजलि दी है। इस कड़ी में नेता सीतारम येचुरी ने ट्वीट किया है- ‘डॉ नामवर सिंह का साहित्य की दुनिया में बहुत विशेष स्थान था। उनका काम और उनका योगदान, उनके जाने के बाद भी कई पीढ़ियों को प्रभावित करेगा। उन्हें श्रद्धांजलि दी।’

नामवर सिंह जी की कविता का एक छोटा सा अंश उनको श्रद्धांजलि देते हुए समर्पित है
नभ के नीले सूनेपन में हैं टूट रहे बरसे बादर
जाने क्यों टूट रहा है तन ,
बन में चिडयों के चलने से टूट रहे पत्ते चरमर
जाने क्यों टूट रहा मन

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