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uttarakhandi mythological instrument

Uttarakhandi Mythological instrument : राज्य की संस्कृति को दर्शाते पौराणिक वाद्य यंत्र

Uttarakhandi Mythological instrument : राज्य की संस्कृति को दर्शाते पौराणिक वाद्य यंत्र

किसी राज्य की संस्कृति ही उसकी पहचान होती है। उत्तराखंड राज्य संस्कृतियों से भरा खजाना है। कहा जाता है की किसी राज्य की संस्कृति की पहचान में राज्य के पौराणिक वाद्य यंत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है। आपको बता दें की हमारे राज्य उत्तराखंड के वाद्य यंत्रो को सिर्फ भारत में नहीं बल्कि विदेशो में भी श्रेष्ठ माना जाता है। राज्य के कुछ पौराणिक वाद्य यंत्रो का विवरण निम्न प्रकार से है –

Uttarakhandi Mythological instrument

हुड़का -लोक वाद्य यंत्रो में हुड़का कुमाऊं में सर्वाधिक प्रयोग में लाया जाता है। यह उत्तराखंड में देवी देवताओ की स्तुति जागर व लोकगीतों में इसकी थापो पर कई गीत व नृत्य किये जाते है। यह एक लकड़ी के खोल से बनाया जाता है जिसे अंदर से खोखला और खाली कर दिया जाता है। फिर इसके ऊपर बकरी के अमाशय की खाल को कस के बाँधा जाता है। उसके बाद एक लकड़ी (जिसे नाली कहते है ) इस बजाने के प्रयोग में लायी जाती है। हुड़का को गले में एक रस्सी या डोरी के माध्यम से लटका कर बजाया जाता है। रस्सी के खिंचाव से हुड़के के किनारो पर खिंचाव पड़ता है जिससे वादक को हुड़के की थाप को स्वर के साथ संतुलित करना पड़ता है। गाँवो में कई शुभावसरो के समय हुड़के को बजाया जाता है। कोई भी शादी ब्याह हुड़के के बिना अधूरी समझी जाती है।

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बिणाई-यह मुख्यत गाँव की औरतो के द्वारा बजाया जाने वाला एक लोक वाद्ययंत्र है। यह एक छोटा सा लोहे से बना वाद्य यंत्र है जिसे महिलाये दांतो के बिच रख के बजाती है। इसके दो सिरे होते है जिसके मध्य में एक लोहे की लचीली पट्टी होती है जिसे अंगूठी से बजाने पर एक कम्पन होता है इस कम्पन से वादक से साँस लेने की वायु से टकराने पर सुरीले स्वर उतपन्न होते है तथा सांस की वायु छोड़ने पर विवधता सुर उतपन्न होता है। यह दोनों वीरह स्वर कई देर तक दर्शको को मंत्रमुग्ध किये रहता है।

घुंघरू – घुंघरू वैसे तो नृत्य का वाद्य है लेकिन यह और जगह भी इस्तेमाल किया जाता है जैसे -छोटे बच्चो के पैरो में इसे बांधा जाता है साथ ही गाँव में लोग अपनी लाठी पर भी इसे बांधते है जिसे राह में आने वाले सांप ,बिछु भाग जाए। गाँव की महिलाये इसे अपनी दन्तुलि में भी बांधती है जिसे काम करते वक़्त उनका मन लगा रहे साथ ही सांप बिच्छू भी भाग जाए।

डौंर -यह जागरो व मांगलिक कार्यो में इस्तेमाल किये जाना वाद्य यंत्र है। जो डमरू की भाँती ही होता है। इसे एक ओर से लकड़ी से सोटे व दूसरी तरफ से हाथ से बजाया जाता है। इसका प्रचलन गढ़वाल में ज्यादा है। कुछ लोगो का यह मनना है की यह भगवान शिव के डमरू का ही एक रूप है। कुमाऊं में जब घन्याली लगाई जाती है तो इसको बजाया जाता है साथ में कांसी की थाली बजायी जाती है।

ढोल -ढोल उत्तराखंड का पारम्परिक वाद्य यंत्र है जिसे समस्त मांगलिक कार्यो में इस्तेमाल किया जाता है। यह विजयसार की मजबूत लकड़ी से बनाया जाता है। इसमें लकड़ी को अंदर से खोखला किया जाता है।साथ ही बायीं तरफ बकरी की खाल व दायीं तरफ भैंस के मांस की खाल को कस के बाँधा जाता है। ढोल बजाने वालो को देवी- देवताओ का प्रतिनिधि माना जाता है। बैसी लगाते समय ढोल बजाने वालो को बावन वीर ,सोलह सौ मसाण व तैंतीस कोटि देवताओ का गुरु मानकर ”गुरु धरिमदस ” कहा जाता है। ढोल वादक 22 तरह की ताल बजाता है। साथ ही ढोल वादक द्वारा ढोल बजाने के साथ साथ कई नृत्य मुद्राओ का प्रदर्शन किया जाता है जिसे ढोल नृत्य कहा जाता है।

Uttarakhandi Mythological instrument

मुरुली -उत्तराखंड में कोई भी वाद्य यंत्र बिना मुरुली के अधूरा है। बांसुरी या मुरुली कुशल कारीगर ही बना पाते है। यह रिंगाल के पुष्ट तनो से बनाई जाती हैं साथ ही इसमें 6 छेंद किये जाते है। यह पर्वतीय क्षेत्र का लोकप्रिय वाद्य यंत्र है गाँव के चरवाहे जब जंगलो में इस मुरुली की तान छेड़ते है तो इंन्सानो के साथ साथ जानवर भी मंत्रमुग्ध हो जाते है। आज भी जब मुरुली में लोग न्योली तान को सुनते है तो उनकी आँखों आंसू आ जाते है।

तुतुरि -तुतुरि तुरही को कहा जाता है इसका मुँह चौड़ा होता है और पिछला हिस्सा ताम्बे का पाइपनुमा होता है बिच से इसे घुमा दिया जाता है। इसको शादी ब्याह में बजाया जाता है। पहले इसे लड़ाई के समय भी इस्तेमाल किया जाता था।

Uttarakhandi Mythological instrument

रणसिंग -यह वीर रस को उत्पन्न करने वाला वाद्य यंत्र है। यह भी ताम्बे से बना सांप के फ़न उठाये जैसी आकृति सा बना होता है। इसे फंक मारकर बजाया जाता है। पौराणिक काल में इसे देवताओ की विजय पर बजाया जाता था साथ ही शादी ब्याह में भी इसे बजाया जाता है।

मशकबीन-मशकबीन को वैसे विदेशी वाद्य यंत्र कहा जाता है किन्तु यह उत्तराखंड की संस्कृति में काफी समय से इस्तेमाल हो रहा है इसलिए इसे उत्तराखंड का पौराणिक वाद्य यंत्र कहने में कोई दोराहे नहीं। मशकबीन एक चमड़े की थैली से बना होता है जिसमे पाइपें लगी होती है। एक पाइप से इसमें फुक मारी जाती है तथा निचले तरफ के पाइप से स्वर निकलता है। उत्तराखंड में इस वाद्य यंत्र को काफी पसंद किया जाता है।

Uttarakhandi Mythological instrument

यहां पर उत्तराखंड के कई पौराणिक वाद्य यंत्रो का विवरण दिया है। किन्तु दुखद स्तिथि यह है की यंत्र कहीं विलुप्त होते जा रहे है। अब इनका इस्तेमाल लगभग खत्म है। अगर इन वाद्यों यंत्रो का सरक्षण न किया गया तो इनका अस्तित्व खत्म हो जायेगा।

सीमा रावत की रिपोर्ट

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