Meri Dandi Kanthi Ka Muluk : गीत पुराना बोल नए ,पलायन पर तीख़ा वार

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Meri Dandi Kanthi Ka Muluk: Geet old lyrics new, sharp attack on escape
"मेरी डांडी कांठियों का मुलुक जैल्यु ,बांजी पुंगड़ियों ते देखि ऐ ई ,उजड़ी कूड़ियों ते देखि ऐई "

Meri Dandi Kanthi Ka Muluk : गीत पुराना बोल नए ,पलायन पर तीख़ा वार

हालही में सोशल मीडिया एकाउंट फेसबुक में एक पोस्ट देखने को मिली पोस्ट में एक प्रचलित गीत जिसे गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी ने गया है और अब यह गीत इस पोस्ट में एक नए तरीके से नजर आया है जो सिर्फ हास्य के मक़सद से बनाया गया है लेकिन यह कहीं न कहीं पहाड़ों में हो रहे वास्तविकता पर तीख़ा वार करता है।

Meri Dandi Kanthi Ka Muluk

गढ़रत्न नरेंद्र सिंह नेगी का गीत मेरी डांडी कांठियों का मुलुक तो आप सभी ने सुना ही होगा अब यह गीत एक नए अंदाज में फेसबुक में एक पोस्ट के जरिये सामने आया है हालांकि गीत तो पुराना है लेकिन गीत के बोल नए हैं। बनाने वाले ने भी क़ाबिले तारीफ़ बोल बनाये हैं। गीत के बोल काफ़ी मज़ेदार व आकर्षक हैं इसकी कुछ लाइनें इस प्रकार से हैं –
“मेरी डांडी कांठियों का मुलुक जैल्यु ,बांजी पुंगड़ियों ते देखि ऐ ई ,उजड़ी कूड़ियों ते देखि ऐई ”

छोरी बिंदास गढ़वाली गीत यहाँ देखें .

Meri Dandi Kanthi Ka Muluk

कभी नरेंद्र सिंह नेगी ने गाया था -“मेरी डांडी कांठियों का मुलुक जैल्यु बसंत ऋतू मा जेई “लेकिन समय का फेर देखिये आज लोगों को गाना पड़ रहा है – “मेरी डांडी कांठियों का मुलुक जैल्यु ,बांजी पुंगड़ियों ते देखि ऐ ई ,उजड़ी कूड़ियों ते देखि ऐई “भले ही गाने वाले ने ये गीत हास्य -विनोद के लिए ही क्यों न गाया हो लेकिन गीत के बोलों में यथार्थता झलक रही है। कमोवेश आज अधिकाँश पहाड़ी गानों की दिशा और दशा यही है। इस गीत को सुनने के लिए नीचे लिंक पर क्लिक करें।

अशोक नेगी की रिपोेर्ट

गीत यहां सुनें

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