उत्तराखंड की प्रमुख जनजातियां, जानिए विस्तार से

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वह सामाजिक समुदाय है जो राज्य के विकास के पूर्व अस्तित्व में था या जो अब भी राज्य के बाहर हैं। जनजाति वास्‍तव में भारत के आदिवासियों के लिए इस्‍तेमाल होने वाला एक वैधानिक पद है।भारत के विभिन्न क्षेत्रो में ऐसे मानव-समूह निवास करते है जो आज भी सभ्यता तथा संस्कृति से आपरिचित है। जो सभ्य समाजों से दूर जंगल, पहाड़ो अथवा पठारी क्षेत्रों मे निवास करते है। इन्ही समूहों को जनजाति, आदिम समाज, वन्य जाति, आदिवासी आदि नामों से जाना जाता है।जनजाति समाज की संस्कृति अन्य समाजों से भिन्न होती है। उनके रीति-रिवाज, विश्वास, भाषा और स्थान अलग-अलग होते है। यदि व्यक्तियों का सामाजिक स्तर समान न हो तब भी उनमें स्तरीकरण एवं विलगता दिखाई नही पड़ती।भारत के संविधान में अनुसूचित जनजाति पद का प्रयोग हुआ है और इनके लिए विशेष प्रावधान लागू किये गए हैं।

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उत्तराखंड में बहुत सी जनजातियाँ निवास करती है l इस आर्टिकल में हम आपको उत्तराखंड की 5 प्रमुख जनजातियों के बारे में बताने वाले है जो इस प्रकार है – थारु, भोटिया, बुक्सा, जौनसारी, और राजी l उत्तराखण्ड में निवास करने वाली इन पांच जनजातियों को वर्ष  1967 में अनुसूचित जनजाति घोषित किया गया था।

उत्तराखंड की जनजातियां 

थारू जनजति –

थारू जनजाति उत्तराखंड व कुमाऊँ का सबसे बड़ा जनजातीय समुदाय है l थारू जनजाति उधमसिंह नगर के खटीमा, नानकमत्ता, सितारगंज, किच्छा आदि क्षेत्रों में निवास करती है।कुछ इतिहासकारों के अनुसार ये राजस्थान के थार मरुस्थल से आकर यहां बसे जबकि कुछ अन्य इतिहासकारों के मतानुसार किरात वंश से इनकी उत्पति मानी जाती है।इनमें मातृसत्तात्मक सयुंक्त व एकाकी परिवारिक प्रथा पायी जाती है। थारू जनजाति में महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा उच्च स्थान प्राप्त है। परिवार का मुखिया घर का सबसे बड़ा ब्यक्ति होता है। थारू जनजाति कई गोत्रों में विभाजित है- बड़वायक, रावत, वृतियां, महतो , डहैत, आदि l इनके प्रमुख त्योहार होली, दशहरा, माघ की खिचड़ी, बजहर आदि हैं। दीपावली को ये शोक पर्व के रूप में मनाते हैं l इनमें बदला विवाह प्रथा(बहनों का आदान प्रदान) का प्रचलन है ।

 

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जौनसारी जनजाति –

जौनसारी उत्तराखण्ड की दूसरी सबसे बड़ी जनजाति है जो मुख्य रुप से भाबर क्षेत्र व देहरादून के चकराता, कालसी, त्यूनी लाखामंडल क्षेत्र, टिहरी का जौनपुर और उत्तरकाशी के परग नेकान क्षेत्र में निवास करते हैं। इनका संबंध इण्डो आर्यन परिवार से देखने को मिलता है। इनकी मुख्य भाषा सारी है तथा कहीं कहीं देवघारी व हिमाचली भाषा भी बोली जाति है। यह जनजाति खसास, कारीगर और हरिजन खसास नामक तीन वर्गों में बाँटी गई है। इस जनजाति की वेशभूषा में पुरुष झंगोली ( ऊनी पजामा), डिगुबा ( ऊनी टोपी) तथा स्त्री झगा (कुर्ती-कमीज) तथा चोल्टी (कुर्ते के बाहर चोली) पहनते हैं। इस जनजाति में बेवीकी, बोईदोदी की और बाजादिया आदि प्रकार के विवाह प्रचलित हैं। ये भी हिन्दू धर्म के उपासक हैं तथा हनौल इनका प्रमुख देवालय है।तीज त्यौहार के रुप में जौनसारी जनजाति के लोग बिस्सू (वैशाखी), पंचाई या पांचो (दशहरा), दियाई (दीपावली) माघत्यौहार, नुणाई, जागड़ा, अठोई (जन्माष्टमी) आदि विशिष्ट त्यौहार मनाते हैं। ये खुद को पांडवों का वंशज बताते हैं तथा दीपावली के एक माह बाद इस त्यौहार को मनाते हैं। इस दिन ये भयलो (हौला) जलाकर खेलते हैं। महासू (महाशिव) इनके प्रमुख देवता हैं।

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भोटिया जनजाति –

उत्तराखंड की भोटिया जनजाति सबसे प्राचीन मानी जाती है।और यह जनजाति खस राजपूतों से अपनी उत्पत्ति मानते हैं। इस वजह से भी इन्हें उत्तराखंड की प्राचीन जनजाति माना जाता है। भोटिया जनजाति की बहुत सी उपजातियाँ है- जो इस प्रकार हैं – मारछा ,तोलछा , जोहारी,शौका , दरमियां, चौंदासी ,व्यासी ,जाड़ ,जेठरा ,छापड़ा (बखरिया ) भोटिया जनजाति महा हिमालय के तलहटी क्षेत्रों में निवास करती हैं। यह जाति पिथौरागढ़ में चमोली उत्तरकाशी में निवास करती है l भोटिया जनजाति तिब्बती एवं मंगोलियन जाति का मिश्रण है, छोटा कद, गोल चेहरा, छोटी आंखें, चपटी नाक, गोरा रंग इनकी शारीरिक विशेषताएं हैं। अगर इनके परिधानों की बात करें तो पुरुषों का अंगरखा रंगा ( पुरुषों का ऊपर पहनने वाला वस्त्र) , पेजामे को गैजू या खगचसी , ऊनी जूते जिन्हें बाँखे कहलाते मुख्य परिधान हैं . स्त्रियों के परिधान में च्यूमाला,च्यूंक्ला ,च्यूबती ,ब्यूजय तथा कम्बयै प्रमुख है l

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बोक्सा जनजाति –

बोक्सा जनजाति के लोग उत्तराखण्ड के तराई- भाबर क्षेत्र में उधमसिंहनगर के बाजपुर, गदरपुर एंव काशीपुर, नैनीताल के रामनगर, पौड़ी के दुगड्डा तथा देहरादून के विकासनगर, डोईवाला एंव सहसपुर विकासखंडों के 173 गाँवों में निवास करते हैं। नैनीताल व उधमसिंहनगर के बोक्सा बहुल क्षेत्र को बुक्सा कहा जाता है। इनके वंशजों के बारे में विद्वानों के विभिन्न मत है कोई इन्हें पंवार वंश का मानता है तो कोई मराठों द्वारा भागाए वंश का वहीं कोई इनका मूल निवास चित्तौड़ मानता है। बोक्सा जनजाति के लोग सर्वेप्रथम 16वीं शताब्दी में बनबसा (चम्पावत) में आकर बसे थे। इस जनजाति के लोगों की शारीरिक बनावट मिश्रित प्रजातिय लक्षणों को इंगित करती है। इस जनजाति के लोगों की बोली भी विशिष्ट नहीं है। इस जनजाति के परिधान में पुरुष धोती, कुर्ता, सदरी औ पगड़ी पहनता है तो स्त्रियां लंहगा और चोली पहनती हैं। ये भी हिन्दू देवी देवताओं के उपासक हैं।

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राजी जनजाति –

राज्य की एकमात्र जनजाति है जो आज भी जंगलों में निवास करती है। और मुख्यतः पिथौरागढ़ जनपद में निवास करती हैl यह जनजाति कोल -किरात वंशज से संबंधित है। इनकी शारीरिक संरचना  छोटा कद , ऊंचे होंठ व चौड़ा चेहरा रहता है l विवाह पूर्व सांगजांगी व पिन्ठा प्रथा प्रचलित है l इनके निवास स्थान को रौत्यूड़ा कहां जाता है। मातृभाषा मुंडा है परंतु स्थानीय भाषा का भी प्रभाव देखने को मिलता है। वधू मूल्य प्रथा का प्रचलन है। कारक संक्रांति व मकर संक्रांति इनके प्रमुख त्योहार है। इस जनजाति में विशेष नृत्य रिंगडांस (थड़िया जैसा नृत्य) प्रचलित  है l और काष्ठ कला व झूम खेती मुख्य कार्य हैं।

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