जानिए पहली गढ़वाली फीचर फिल्म की अनसुनी कहानी

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भारत की पहली फ़िल्म कौन-सी थी? ये सवाल आप गूगल करेंगे तो जवाब मिलेगा ‘राजा हरीश चंद्र’. लेकिन क्या आप जानना चाहोगे की उत्तराखंड की पहली बोली में बनी फिल्म यानि की गढ़वाली फिल्म कौन सी थी और कब और किन परस्थितियों में किस उदेश्य के साथ बनाई गई थी ? 

देश की तुलना में देखें तो उत्तराखंडी सिनेमा जगत का सूर्योदय काफी देर से हुआ. जैसा कि आपको बता दें कि देश की पहली ऑडीओ-विज़ूअल फ़िल्म 1931 में ही बन चुकी थी, वहीं पहली उत्तराखंडी फ़िल्म इसके करीब पचास साल बाद 1980 के दशक में बनी,लेकिन 80 का ये दशक उत्तराखंडी सिनेमा जगत के लिए एक नई उम्मीद लेकर आया l हालांकि इससे पहले तक यहां गढ़वाली-कुमाऊंनी थिएटर खूब होने लगा था ,लेकिन फ़ीचर फ़िल्मों की दस्तक उत्तराखंडी सिनेमा में 80 के दशक से ही हुई l राज्य में फिल्म जगत की शुरुवात 80 के दशक में हुई। जग्वाल उत्तराखंड फिल्म जगत की पहली फिल्म थी। जिसके निर्माता पारेश्वर गौड है। और पराशर गौड़ गढ़वाली फिल्म जगत के पहले निर्माता हैं ।  ‘जग्वाल’ का शाब्दिक अर्थ है लम्बे समय का इंतज़ार

 

कहानी –

‘जग्वाल’ एक युवा महिला इंदु की कहानी है जिसकी शादी के दिन दूल्हे के छोटे गूंगे भाई का पुजारी के साथ झगड़ा हो जाता है. दूल्हा इसमें हस्तक्षेप करता है और इस दौरान पुजारी को गलती से गंभीर चोटें आ जाती हैं. शादी की रात पुलिस दूल्हे को गिरफ्तार कर लेती है और उसे 10 साल के लिए जेल में डाल दिया जाता है. दूल्हा अपनी पत्नी को सलाह देता है की वह उसके लिए इंतज़ार ना करे और उसके छोटे भाई से शादी कर ले लेकिन वह अपने लिए इंतज़ार करने का रास्ता चुनती है. दुःख और कठिनाइयां झेलने के बाद इंदु विजयी हो कर उभरती है और उसकी ‘जग्वाल’ एक खुशनुमा अंत में बदल जाती है वह दुबारा अपने पति से मिलती है l

साल 1982 में जग्वाल फिल्म की शूटिंग शुरू हुई थी और मात्र 28 दिनों में ये पूरी फ़िल्म शूट की गई l फ़िल्म की करीब 80 प्रतिशत शूटिंग पौड़ी में हुई थी, पौड़ी के अलावा बुवाखाल, श्रीनगर, दुगड्डा, कोटद्वार और मुम्बई में भी इसकी शूटिंग हुई. जग्वाल फिल्म कुल एक घण्टा 20 मिनट की थी l इस फ़िल्म में कई सूंदर गीत रचे गए है, काला डांडा पार बाबा और मेरी बौ सुरेला गीत काफी चर्चित रहा है l

रिलीज होने के बाद उत्साह – 

बता दें 4 मई 1983 के दिन, दिल्ली के रफ़ी मार्ग में स्थित मावलंकर हॉल में  फिल्म ‘जग्वाल’  दिखाई जा रही थी l इस फिल्म के टिकट को पाने के लिए सैकड़ों लोगों की भीड़ हॉल के बाहर जुटी हुई थी l  फ़िल्म देखने का लोगों में इतना उतावलापन था कि धक्का-मुक्की रोकने के लिए पुलिस तक बुलानी पड़ गई थी, ये उतावलापन इसलिए था क्योंकि दिल्ली के एक हॉल में पहली उत्तराखंडी फ़िल्म दिखाई जा रही थी l गढ़वाली भाषा में बनी इस फ़िल्म की लोगों में कैसी दीवानगी थी, इसका अंदाज़ा ऐसे लगाइए कि 5 रुपए का फ़िल्म टिकट हॉल के बाहर 100 रुपए तक में ब्लैक हो रहा था l जब फिल्म निर्माता पाराशर गौड़ खुद मावलंकर हॉल पहुंचे तो उन्होंने देखा कि वहां एक भी सीट खाली नहीं थी l  सारा हॉल लोगों से खचाखच भरा हुआ था और कहा ये भी जाता है कि फ़िल्म के टिकट के लिए कुछ लोगों ने उनके साथ भी छिना-झपटी भी की और इसमें उनका कुर्ता तक फट गया था l

 

 

वर्तमान स्थिति =

वही उत्तराखंड के हरे-भरे पेड़-पौधे और हसीन वादियां बॉलीवुड और हॉलीवुड निर्माताओं को भी खींच लाती है, लेकिन यहां की स्थानीय फिल्में आज भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है. बेहतरीन कहानी, पहाड़ का दर्द बयां करती गढ़वाली फिल्मों के प्लाट, लोकेशन और कलाकारों की मेहनत अन्य फिल्मकारों की तरह ही होती हैं.जटिल भोगौलिक स्थिति और सीमित संसाधनों के बावजूद फिल्म निर्माता और निर्देशक गढ़वाली फिल्में बनाते हैं और कुछ ही जगह पर पर्दे पर फिल्में रिलीज हो पाती हैं ,कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि जितनी मेहनत गढ़वाली फिल्मों को बनाने के लिए लगती है, उतना सफल यह नहीं हो पाती है वर्तमान में भी गढ़वाली फीचर फ़िल्में अपने अस्तित्व के लिए लड़ रही है l