जानिए गढ़वाल के इन पंचप्रयागों की मह्तवत्ता और इनसे जुड़ा गहरा रहस्य

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प्रयाग जब यह शब्द किसी आम व्यक्ति के जेहन में आता है तो बरबस ही ध्यान उत्तर प्रदेश के शहर इलाहाबाद की तरफ चला जाता है। असल में इलाहाबाद का मूल नाम प्रयाग ही है और उसका यह नाम इसलिए पड़ा क्योंकि वहां पर गंगा और यमुना का संगम होता है। यह भी कहा जाता है कि एक तीसरी नदी सरस्वती भी वहां पर मिलती है लेकिन वह अदृश्य है। भारत में दो नदियों के संगम पर कई तीर्थस्थल है और इनके नाम से प्रयाग जुड़ा हुआ है। भारत में इस तरह के 14 प्रयाग हैं और इनमें पांच प्रयाग उत्तराखंड के गढ़वाल क्षेत्र में हैं। देवप्रयाग, रूद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग और​ विष्णु प्रयाग। इन पांचों तीर्थस्थलों पर विभिन्न नदियां अलकनंदा नदी से मिलती हैं जिसका उदगम स्थल सतोपंथ और भगीरथ खड़क ग्लेशियर को माना जाता है। पांचों प्रयागों का उत्तराखंड में खास महत्व है और लोग किसी पर्व या आम दिनों में भी इन स्थलों पर स्नान करने के लिये आते हैं। 

 

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विष्णु प्रयाग-

गढ़वाल के पंच प्रयाग में बद्रीनाथ के सबसे करीब स्थित है विष्णु प्रयाग जहां अलकनंदा नदी और धौलीगंगा या विष्णुगंगा नदी का मिलन होता है। यह नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि विष्णु प्रयाग का नाम भगवान विष्णु के नाम पर पड़ा है। कहा जाता है कि नारद मुनि ने इसी स्थल पर भगवान विष्णु की तपस्या की थी। उन्होंने पंचाक्षरी मंत्र का जाप किया और स्वयं विष्णु भगवान उनको दर्शन देने के लिये यहां पधारे थे।

नंदप्रयाग

नंदप्रयाग “पंचप्रयाग” में से दूसरा प्रयाग है | यह  प्रयाग उत्तराखंड भूमि में स्थित पर्यटन स्थलों में से एक है | उत्तराखंड में नन्दाकिनी तथा अलकनंदा नदियों के संगम पर “नन्दप्रयाग” स्थित है। कर्णप्रयाग से उत्तर में बदरीनाथ मार्ग पर लगभग 21 किमी आगे नंदाकिनी एवं अलकनंदा नदियों का पावन संगम है। इस स्थान को द्वापर युग में “यदु साम्राज्य की राजधानी” माना जाता था । यहां पर नंदादेवी का बड़ा सुंदर मन्दिर है। नंदादेवी का मंदिर, नंद की तपस्थली एवं नंदाकिनी का संगम आदि योगों से इस स्थान का नाम “नंदप्रयाग” पड़ा | नंदाकिनी नदी का उद्गम स्थल “नंदादेवी पर्वत” का ग्लेशियर है और यह कहा जा सकता है कि पर्वत और वहां से निकली नदी के नाम पर इस जगह का नाम “नंदप्रयाग” पडा होगा लेकिन पौराणिक कथा में इसका सम्बन्ध भगवान कृष्ण से जोड़ा जाता है |

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कर्णप्रयाग –

ऋषिकेश से कर्णप्रयाग लगभग 174 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इसी स्थान पर पिंडर ग्लेशियर से निकलने का बाद पिंडर नदी अलकनंदा नदी में मिल जाती है। चमोली क्षेत्र में स्थित इस क्षेत्र का नाम कर्णप्रयाग महाभारत के योद्धा कर्ण के नाम पर रखा गया है। प्राचीन कथाओं के अनुसार महायोद्धा कर्ण ने इसी स्थान पर भगवान सूर्य का ध्यान किया था और उनसे कवच और कुंडल प्राप्त किए थे। महाभारत में कर्ण की मृत्यु के बाद भगवान श्री कृष्ण ने इसी स्थान पर कर्ण का अंतिम संस्कार किया था l

 

रुद्रप्रयाग-

उत्तराखंड में स्थित रुद्रप्रयाग अलंकनंदा नदी के पांच प्रयाग में से एक है l अलकनंदा और मंदाकिनी नदी यहां मिलती हैं l कहा जाता है कि इसी जगह पर भगवान शिव ने नारद को आशीर्वाद दिया था और रुद्र अवतार में प्रकट हुए थे l हिमालय के नजदीक होने की वजह से यह जगह काफी खूबसूरत दिखाई पड़ती है और पर्यटक भी यहां आते रहते हैं. रुद्रप्रयाग में कई पवित्र मंदिर भी है जिसे देखने के लिए सालों भर भक्त पहुंचते हैं l इनमें जगदंबा और शिव मंदिर प्रमुख हैं l इसके साथ-साथ अलकनंदा नदी के पास स्थित कोटेश्वर मंदिर भी श्रद्धालुओं के बीच काफी प्रसिद्ध है l

 

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देवप्रयाग

देवप्रयाग में श्री रघुनाथ जी का मंदिर है, जहाँ हिंदू तीर्थयात्री भारत के कोने कोने से आते हैं। देवप्रयाग अलकनंदा और भागीरथी नदियों के संगम पर बसा है। यहीं से दोनों नदियों की सम्मिलित धारा ‘गंगा’ कहलाती है। यह स्थान उत्तराखण्ड राज्य के पंच प्रयाग में से एक माना जाता है। इसके अलावा इसके बारे में कहा जाता है कि जब राजा भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर उतरने को राजी कर लिया तो ३३ करोड़ देवी-देवता भी गंगा के साथ स्वर्ग से उतरे। तब उन्होंने अपना आवास देवप्रयाग में बनाया जो गंगा की जन्म भूमि है। भागीरथी और अलकनंदा के संगम के बाद यही से पवित्र नदी गंगा का उद्भव हुआ है। यहीं पहली बार यह नदी गंगा के नाम से जानी जाती है। गढ़वाल क्षेत्र में मान्यतानुसार भगीरथी नदी को सास तथा अलकनंदा नदी को बहू कहा जाता है।