जानिए देवलगढ़ के इस खास मंदिर का इतिहास, कैसे हुआ माता गौरा का यहां निवास 

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जानिए देवलगढ़ के इस खास मंदिर का इतिहास, कैसे हुआ माता गौरा का यहां निवास 

देवलगढ़ पहाड़ों के बीच बसा एक छोटा और प्यारा शहर है जो कि उत्तराखंड के पौड़ी जिले में स्थित है l इस शहर का नाम कांगड़ा के राजा देवल से पड़ा है जिसने इस शहर की स्थापना की थी। श्रीनगर से पहले, 16 वीं शताब्दी में अजय पाल के शासनकाल के दौरान देवलगढ़ गढ़वाल साम्राज्य की राजधानी था। अपने अतीत के अतीत के कारण, यह शहर अपने पूजनीय मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। विशेषकर माँ गौरा देवी के मंदिर के लिए जो अति सुंदर प्राचीन गढ़वाली वास्तुकला को दर्शाता है जो इस खूबसूरत शहर को सुशोभित करता है।

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गौरा देवी मंदिर देवी पार्वती को समर्पित है और माना जाता है कि इसे 7 वीं शताब्दी ईस्वी में बनाया गया था और इसे केदारनाथ और बद्रीनाथ के रूप में काफी पुराना माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह कहा जाता है कि मंदिर का निर्माण भगवान कुबेर ने किया था। फसल के मौसम के दौरान, एक बड़े मेले का आयोजन किया जाता है। स्थानीय लोग ताज़े गेहूँ से बने रोटी को देवी को प्रसाद के रूप में चढ़ाते हैं।

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गौरा देवी (गैरजादेवी) मन्दिर की गणना प्राचीन सिद्धपीठों में की जाती है।  सातवीं शताब्दी का बना यह पाषाण मन्दिर प्राचीन वास्तुकला का अतुलनीय उदाहरण है। माँ भगवती गौरादेवी सुमाड़ी के काला परिवार की कुलदेवी हैं आपको बता दें की देवलगढ़ में माँ राजराजेश्वरी का भी भव्य मंदिर है जो की गढ़वाल के राजवंश की कुलदेवी थी इसलिये उनकी पूजा देवलगढ़ स्थित राजमहल के पूजागृह में होती थी। और उस वक्त जनता के लिये एक और मन्दिर की आवश्यकता महसूस करते हुये देवलगढ़ में गौरा मन्दिर का निर्माण कराया गया। इस मन्दिर में शाक्त परंपरा प्रचलित रही है। यहां मुख्यरूप से भगवती गौरी (पार्वती)  व सिंह वाहिनी देवी कि प्रतिमा स्थापित हैं।

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वही माँ गौरा देवी के प्रसिद्ध ऐतिहासिक मंदिर में हर वर्ष बैशाखी के दिन एक भव्य मेले का आयोजन किया जाता है।  बैसाखी के पावन पर्व पर हर वर्ष माँ गौरा भगवती रीतिनुसार 4 महीने मायके (सुमाड़ी ) में रहने के बाद ससुराल (देवलगढ़ ) आती है। 13 अप्रैल को रात्रि जागरण किया जाता है। 14 अप्रैल को माँ भगवती गर्भगृह से बाहर आकर जब मायके वाले आते है तब जाकर हिन्डोंला खेलती हैं। देवलगढ मे माँ गौरा देवी के दर्शन के लिए दूर-दूर से हजारों भक्त दूर-दूर से आते हैं। और माँ भगवती गौरा देवी सभी आये हुए भक्तों को आशीष देते हुए भावुक होकर नम आंखों से अपने मायके वालों और सभी भक्तों से विदाई लेकर अपने गर्भ में जाती है।

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