जानिए महासू देवता मंदिर और उनकी कहानी

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देवभूमि उत्तराखंड में कई लोक देवताओं के मंदिर स्थापित हैं, जो हमारी स्थापत्य कला की उत्कृष्ट धरोहर हैं। ऐसा ही एक विशिष्ट स्थान लिए हुए मंदिर उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल के सीमांत जिले उत्तरकाशी के हनोल क्षेत्र में टौंस नदी के तट पर महासू देवता का है। दरअसल महासू देवता एक नहीं चार देवताओं का सामूहिक नाम है और स्थानीय भाषा में महासू शब्द महाशिव का ही पर्याय है। चारों महासू भाइयों के नाम बासिक महासू, पबासिक महासू, बूठिया महासू (बौठा महासू) और चालदा महासू हैं। ये सभी भगवान शिव के ही रूप हैं।

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महासू देवता मंदिर, उत्तरकाशी जिले के जौनसार-बावर क्षेत्र में स्थान हनोल में टौंस नदी के तट पर स्थित है। देहरादून से लगभग 175 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हनोल समुद्र तट से 1250 मीटर की ऊंचाई पर त्यूनी मोटर मार्ग पर पड़ता है। महासू देवता मंदिर संस्कृति और कला की एक अनमोल धरोहर है। माना जाता है कि मंदिर में सच्चे मन से प्रार्थना करने पर भक्तों के मन की मुराद पूरी हो जाया करती है। मंदिर की बनावट और पौराणिक किस्से अपने आप में अद्भुत हैं। प्रति वर्ष हजारों की संख्या में पर्यटक मंदिर के दर्शन के लिए आते रहते हैं।
महासू देवता की पूजा केवल उत्तराखंड में ही नहीं होती, बल्कि हिमाचल प्रदेश के कई क्षेत्रों में इनकी अत्यधिक मान्यता है और जब उत्तरकाशी के महासू देवता मंदिर में मेला लगता है तो उसमें उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश से बड़ी तादाद में श्रद्धालु भाग लेने आते हैं। महासू देवता की पूजा के लिए उत्तराखंड के उत्तरकाशी, जौनसार-बावर क्षेत्र, रंवाई के साथ हिमाचल प्रदेश के शिमला सिरमौर, सोलन, बिशैहर और जुब्बल तक से श्रद्धालु आते हैं। महासू न्याय के देवता माने जाते हैं और उनके मंदिर को न्यायालय के तौर पर माना जाता है।
महासू देवता की कहानी-
 
महासू देवता भगवान भोलेनाथ के रूप हैं। मान्यता भी है कि महासू ने किसी शर्त पर हनोल का यह मंदिर जीता था। महासू देवता जौनसार बावर, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के ईष्ट देव हैं। यह मंदिर 9वीं शताब्दी में बनाया गया था वर्तमान में यह मंदिर पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (एएसआई) के संरक्षण में है।
किवदंती है कि महासू देवता का मंदिर जिस गांव में बना है उस गांव का नाम हुना भट्ट ब्राह्मण के नाम पर रखा गया है। इससे पहले यह जगह चकरपुर के रूप में जानी जाती थी। पांडव लाक्षा ग्रह( लाख का महल) से निकलकर यहां आए थे। हनोल का मंदिर लोगों के लिए तीर्थ स्थान के रूप में भी जाना जाता है।
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महासू देवता के मंदिर के गर्भ गृह में भक्तों का जाना मना है। केवल मंदिर का पुजारी ही मंदिर में प्रवेश कर सकता है। यह बात आज भी रहस्य है। कि मंदिर में हमेशा एक अखंड ज्योति जलती रहती है जो कई वर्षों से जल रही है। मंदिर के गर्भ गृह में पानी की एक धारा भी निकलती है, लेकिन वह कहां जाती है, कहां से निकलती है यह अज्ञात है।
मंदिर में महासू देवता के नाम का भी गूढ़ अर्थ है। मान्यता है कि महासू का मतलब है- महाशिव, जो अपभ्रंश होकर महासू हो गया। उत्तराखण्ड के उत्तरकाशी, संपूर्ण जौनसार-बावर क्षेत्र, रंवाई परगना के साथ साथ हिमाचल प्रदेश के सिरमौर, सोलन, शिमला, बिशैहर और जुब्बल तक महासू देवता की पूजा होती है। उत्तराखंड के इन क्षेत्रों में महासू देवता को न्याय के देवता और मन्दिर को न्यायालय के रूप में माना जाता है। वर्तमान में महासू देवता के भक्त मन्दिर में न्याय की गुहार करते हैं और उसमें अर्जी लगाते है, जिससे उनको न्याय तुरन्त मिलता हैं।

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