बाल दिवस के अवसर पर पिथौरागढ़ में हुआ जौलजीबी मेले का आयोजन

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jauljibi fair

उत्तराखंड में हमेशा से विभिन्न मेलो का आयोजन होता रहता है। ये मेले उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर को संभाले व एक दूसरे से जोड़े रखने का काम करते है। एक ऐसे ही मेले का आयोजन पिथौरागढ़ जिले में किया गया। जो की जौलजीबी में किया गया। जौलजीबी का मेला उत्तराखंड के प्रसिद्ध मेलो में से एक है।

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14 नवंबर को उत्तराखंड के पिथौरागढ़ में जौलजीबी मेले का आयोजन किया गया। जौलजीबी कस्बा पिथौरागढ़ जिला मुख्यालय से 68 किमी की दूरी पर बसा है। जौलजीबी कस्बा गोरी और काली नदी के संगम पर बसा है। तीन देशों की लोक संस्कृति को संजोये यह मेला वर्षों से चल रहा है। जौलजीवी मेले को प्रारम्भ करने का श्रेय अस्कोट के पाल ताल्लुकदार स्व. गजेन्द्र बहादुर पाल को जाता है। यह मेला सन् 1914 में प्रारम्भ किया गया था। स्कन्द पुराण में भी मानसरोवर जाने वाले यात्री को काली-गोरी के संगम पर स्नानकर आगे जाने का वर्णन है।

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बता दें की मार्गशीर्ष माह की वृश्चिक संक्रान्ति को मेले का शुभारम्भ संगम पर स्नान से होता था। वर्ष 1974 तक पाल रियासत के वारिसों के हाथ में जौलजीबी मेले की बागडोर थी। इसके बाद में वर्ष 1975 में यूपी सरकार ने मेले को अपने हाथों में ले लिया और तभी से ये मेला देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन पर 14 नवम्बर से मनाया जाने लगा। ज्ञात होगा की 1962 में चीनी आक्रमण से पूर्व मेले में तिब्बत और नेपाल के व्यापारियों की सक्रिय भागीदारी थी, लेकिन भारत चीन युद्ध के बाद से तिब्बती व्यापारियों और कौतिक्यारों का जौलजीबी मेले में आना बंद हो गया। आज भले ही तिब्बती व्यापारी इस अन्तर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक-व्यापारिक मेले में शिरकत नहीं करते लेकिन भारत-चीन के मध्य होने वाले स्थलीय व्यापार के जरिये भारतीय शौका व्यापारियों द्वारा तिब्बत से आयात किया गया माल जौलजीबी मेले में बेचा जाता है। इस मेले में तिब्बती सामान की भारी खरीद होती है।

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पिछले 10-15 सालों से इस मेले में मेरठ, लुधियाना, कानपुर, कोलकाता के व्यापारियों तथा हल्द्वानी, बरेली, रामनगर और टनकपुर मण्डियों के आढ़तियों की आमद लगातार बढ़ी है। अब परम्परागत वस्तुओँ के स्थान पर आधुनिक वस्तुओं का क्रय-विक्रय ज्यादा होने लगा है। मेले में जिला बाल विकास, खादी ग्रामोद्योग, उद्यान विभाग, सूचना विभाग, जनजाति विकास विभाग कृषि-बागवानी आदि विभागों द्वारा स्टॉल तथा प्रदर्शनी भी लगाई जाती है। इसके अतिरिक्त झूले-सर्कस आदि के साथ-साथ स्थानीय विद्यालयों के छात्र-छात्राओं द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है।

इस बार मेले में भारी तादार में लोग पहुंचे। अलग अलग सम्प्रदाय के लोगो ने अपनी संस्कृति की झलक सभी के पेश की। विभिन्न उत्तराखंडी व्यंजन व परम्परागत वस्तुओ से भी लोग अवगत हुए। ये मेले कहीं न कहीं उत्तराखंड की संस्कृति को समूचे देश के सामने पेश करते है, व लोगो को अवसर देते है उत्तराखंडी संस्कृति को समझने का।

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