हैलो यूके उत्तराखण्ड की पहली राजनैतिक फीचर फिल्म! सभी उत्तराखण्ड वासियों को जरूर देखनी चाहिए!

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उत्तराखण्ड राज्य बने 19वां वर्ष शुरुवाती दौर में है लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुई है। उत्तराखण्ड की धूमिल होती राजनीति का पूरा वर्णन हैलो यूके(हैलो उत्तराखण्ड ) फिल्म के जरिए समाज को जागरूक करने की कोशिश की गई है कि किस तरह से तथाकथित राजनेता अपनी टांग ऊपर रखने के लिए जनता का शोषण करते हैं। चुनावी मौसम में दिखने वाले राजनेताओं की मंशा सिर्फ वोट हासिल करना ही होता है उससे ज्यादा उन्हें जनता से कोई खास लगाव नहीं है ,इसी को हैलो यूके फिल्म निर्माता ने अपनी फिल्म के माध्यम से दिखाया है

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हेलो यूके उत्तराखण्ड की राजनीती पर पहली फीचर फिल्म बनी है ,इस फिल्म के निर्माण का मुख्य उद्देश्य भारत के मष्तक पर विराजमान उत्तराखण्ड राज्य के बारे में देश दुनिया को यह बताना है कि उत्तराखण्ड राज्य में संस्कृति एवं परम्पराओं के अलावा फिल्म निर्माण की भी अपार संभावनाएं हैं। इस फिल्म के अनेक गहरे अर्थ हैं, लेखक निर्देशक ने हास्य व्यंग्य के माध्यम से बहुत ही सुन्दर ढंग से बाल्य उत्तराखंड की स्थिति से आम जन को जागरूक करने की बहुत गंभीर बातें कही हैं। उत्तराखण्ड के शहीदों के प्रति ध्यान आकर्षित करना (निशंदेह जिसने इस राज्य का भला होने का सपना देखकर अपने प्राणो का सर्वोच्च बलिदान दिया हो, उसे ही आज राज्य की चिंता होगी), बालक उत्तराखंड के सिर पर हर वक्त हजारों करोड़ रूपी कर्ज का बोझ होना (एक प्रकार से प्रत्येक उत्तराखंडी नागरिक के सिर पर आज कर्जा है), पानी के नल जैसे छोटो छोटी बात के लिए भी मंत्री- सरकार को फोन करने का प्रचलन, आपदा विभागों में अधिकारियों की उदासीनता, नेतावों व सम्पन्न नागरिकों और कलाकारों का पलायन कर शहरों में बस जाना, मंत्रियों का महिला प्रेम, मल्टीप्लस दलालों व् भ्रष्टाचार का बोलबाला, गाँवों से पलायन की चिंता, राज्य आंदोलनकारियों की अनदेखी। और इन सबसे ऊपर पूरी फिल्म बनाने व् प्रदेश को बचाने के लिए जबरदस्त सन्देश ” नागरिकों से मतदान का सदुपयोग करने का आह्वान”।

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फिल्म में कलाकारों का शानदार अभिनय, गजब संवाद, फाइट, एक्शन, कर्णप्रिय गीत संगीत, खूबसूरत फोटोग्राफी सबकुछ कमाल है। फिल्म की पूरी स्टार कास्ट से आपका परिचय करा दें इसमें आपको उत्तराखण्ड फिल्म जगत के कई कलाकार एकसाथ नजर आएंगे। फिल्म का निर्देशन एवं लेखन प्रदीप भंडारी ने किया है।एस.पी ध्यानी,प्रदीप भंडरी,जस्सी पंवार ,मनीष वर्मा,मुकेश शर्मा,मिनी उनियाल,वंदना,विजय भारती,मनोज टम्टा,नागेंद्र प्रसाद,बंसी लाल, संदीप राणा,शोभना रावत,मुकेश त्यागी जैसे बेहतरीन कलाकार दिखेंगे। असिसटेंट निर्देशन की भूमिका विजय भारती ने निभाई। फिल्म में छायांकन विजय चानना ने किया है।M V H Entertainment के बैनर तले फिल्म का निर्माण किया गया है।फिल्म में गुरमीत गुसांई,विक्की भारद्वाज एवं मीना राणा के गीत हैं।

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हिलीवुड न्यूज़
राकेश धिरवांण

उत्तराखण्ड की राजनीती से हकीकत में अगर कोई रूबरू होना चाहता है तो ये फिल्म जरूर देखें:

एक नजर उत्तराखण्ड में फिल्म निर्माण को लेकर कुछ बातें जो सोचने योग्य हैं:

उत्तराखंड में बनने वाली फिल्मों का भविष्य अधर में लटका है और शायद यही कारण है अब कोई भी फिल्म निर्माता गढ़वाली फिल्म बनाने में रूचि नहीं लेता उसका एक नहीं अनेक कारण हैं जिनसे आज हम आपको अवगत कराने का प्रयत्न करेंगे।1981 में पहली फिल्म जग्वाल बनने के बाद अब तक कई गढ़वाली/कुमाउँनी फ़िल्में बन चुकी हैं।विकास होने के विपरीत सिनेमा जगत और पीछे जाने की राह पर है,ऐसा नहीं है कि उत्तराखण्ड में प्रतिभाओं की कोई कमी है। उत्तराखण्ड की प्रतिभा को देश दुनिया ने माना है,संस्कृति के प्रचार-प्रसार में गीत संगीत और फिल्मों का बहुत महत्त्व होता है कई बार देखने वाले वही अपना लेते हैं जो फिल्म में दिखाया जाता है,लेकिन जिन लोगों ने इस संस्कृति को बचाने के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया उनकी सुनने वाला कोई है ही नहीं? वहीँ जब बॉलीवुड की या अन्य प्रांतों की कोई भी रीजनल भाषा में कोई फिल्म बनती है तो वह पूरे देश-भर के सिनेमा घरों में देखी जाती है और अच्छा धन अर्जित करती हैं जिससे वहां के फिल्म निर्माता लगातार इस कार्य में लगे रहते हैं।
लेकिन उत्तराखण्ड के फिल्म निर्माताओं को फिल्म बनाने के लिए कई बार मंथन करना पड़ता है और तमाम तरह की औपचारिकता पूरी करने के बाद एक आध ही शो किसी सिनेमा घर में लगते हैं और वहीँ थियेटर मालिक अपने नुकसान से बचने के लिए इसे ज्यादा लगने नहीं देता उनका कहना होता है इससे उनके कारोबार में नुकसान होता है।
अगर कहीं फ़िल्में लगेंगी ही नहीं तो निर्माता किसके लिए फिल्म बनाए और बन भी गई तो उसे दिखाए कहाँ? ये सवाल राज्य की उम्र के साथ बढ़ता ही चला जा रहा है पर आज तक इसका उचित समाधान नहीं मिल पाया है।
इसके जिम्मेदार शायद हम सभी उत्तराखण्डी ही हैं जो अपनी संस्कृति को इतना महत्व न देते हों और जो अपनी बोली भाषा को बोलने में झिझक करता हो उससे क्या उम्मीद रख सकते हैं कि कहीं भी उसका गढ़वाली/कुमाउनी फिल्म देखने का मन हो।ये स्वयं को पीछे धकेलने वाली बात है जब हम आगे बढ़ना ही नहीं चाहते तो कोई हमारा साथ क्यों देगा। जब देखने वाले ही नहीं हैं तो फिल्म निर्माता किसके लिए फिल्म का निर्माण करें। ऐसा भी नहीं है अब फिल्मों का निर्माण नहीं हो सकता आधुनिकता के दौर में कई बेहतरीन फिल्मों का निर्माण हो सकता है जो उत्तराखण्ड के कर्मठ फिल्म निर्माता अपने प्रयासों से अपनी संस्कृति एवं परंपरा को दुनिया तक दिखा रहे हैं।

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