क्या आपने सुनी है उत्तराखंड के इन मशहूर वाद्य यंत्रों की धुन,पढ़ें खास रिपोर्ट

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उत्तराखंड लोक गीतों, लोक नृत्यों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों का खजाना है l उत्तराखंड के पर्वतीय इलाकों के वाद्य यंत्र हों या उनसे निकलने वाला संगीत, दोनों बेहद विशिष्ट हैं. उत्तराखंड राज्य की परिकल्पना में पर्वतीय क्षेत्र की विशिष्ट संस्कृति एक महत्वपूर्ण बिंदु है यहां के वाद्य यंत्रों के बिना उत्तराखंडी संस्कृति थोड़ी फीकी सी लगती है साथ ही यहां के संगीत में प्रयुक्त होने वाले वाद्य यंत्रो का प्रयोग भारत के साथ साथ विश्व के हर कोने में किया जाता है, और आज के इस आर्टिकल में हम जानेंगे उत्तराखंड के प्रमुख वाद्य यंत्र l  

ढोल दमाऊं –

ढोल उत्तराखण्ड का पारंपरिक वाद्य यंत्र है, जिसका उपयोग देवताओं के जागर, शादी-विवाह और समस्त मांगलिक कार्यों में किया जाता है। ढोल का निर्माण ताँबे या साल की लकड़ी से किया जाता है, इसकी बाई पुड़ी पर बकरी की पतली खाल और दाई पुड़ी पर बारहसिंगा या भैंस की खाल चढ़ी होती है।
दमाऊं (दमामा) − यह ताँबे या साल की लकड़ी से निर्मित एक प्रमुख वाद्ययंत्र है, जो एक फुट व्यास तथा आठ इंच गहरे कटोरे के समान होता है। इसके मुख पर मोटे चमड़े की पुड़ी (खाल) चढाई जाती है।

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हुडुक या हुड़की

कुमाऊँ के कत्‍यूरी राजा दुलाशाह के दरबार में लगभग छठी शताब्‍दी के पूर्वार्द्ध में बिजुला नैक द्वारा हुडकी बजाई जाने का उल्‍लेख कत्‍यूरियों की गाथा में मिलता है। हुडुक उत्तराखंड का एक महत्वपूर्ण लोक वाद्य यंत्र है, जिसे जागरों, कृषि कार्यों तथा युद्ध प्रेरक प्रसंगो में बजाया जाता है।इसकी लम्‍बाई लगभग 1 फुट 3 इंच होती है, तथा इसकी पुडियों को बकरी के आमाशय की भीतरी खाल से बनाया जाता है।

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 डौर थाली-

डौर थाली गढ़वाल का दूसरा प्रमुख वाद्य है। डौर (डमरु) शिव का वाद्य है। वादक ढोल की तरह डमरू को लाकड़ और हाथ से बजाता है। घुटनों के बीच डमरू को रखकर डौरिया डमरू बजाने वाला दाहिने हाथ से डौर पर शब्द करता है और बायें हाथ से शब्दोत्पत्ति में उंगलियों का संचार कर आवश्यक देवताओं की तालों की उत्पत्ति करता है। कांसे की थाली बजाने वाला बायें हाथ को उठाकर बायें अंगूठे पर थाली को टिकाता है और दायें हाथ से लाकुड थाली पर माराता है, जिससे दौर के शब्दों के अनुसार शब्द निकलते हैं। देवताओं का नर्तन होता है। डौर थाली वादन केवल ब्राह्मण पुरोहित करते हैं। इसको घड़ियाला या घड़ियालो कहते हैं। घड़ियाला देव शक्ति के आहवान, नर्तन एवं पूजन के लिए ब्राह्मण पुरोहितों के द्वारा जागर गाकर और थाली बजा-बजा कर सम्पन्न करता है। जागरी या घड्याल्या विशेष कर देवनृत्यों में देवताओं को नचाने और देवशक्ति के आहवान के लिए ही डौर थाली बजाकर नृत्य करते हैं। या कभी धर्याभूत, आंछरी, रणभूत और भूत नचाने के लिए भी घड़याल्या इनके जागर गाकर नृत्य करवाता है। शेष नृत्यों को नचाने का कार्य औजी ही करते हैं।

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– दोलक-

दोलक या ढोलक वाद्ययंत्र को गढ़वाल के बाद्दी पेशेवर जाति बजाते हैं। घर के आंगन में बाही ढोल बजाता है। बादणी बादी की पत्नी या कोई और नर्तकी ढोलक के तालों के साथ नृत्य करती है। बादी गाता है बादीणी स्वरों को दुहराती है और नृत्य करती है। ऐसे नृत्य में नर्तकियों की संख्या तीन तक हो सकती हैं। बादी को बेडा और बादाणी को बेडिन के नाम से भी जाना जाता है। दो ताल के साथ बजाया जाता है।

 

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मशकबीन

मशकबीन एक यूरोपियन वाद्य यंत्र है, जिसमें एक चमड़े की थैली में चार छेद होते है, जिनमें एक पाइप नीचे की ओर तथा तीन पाइप ऊपर की जोड़े जाते है। मशकबीन में हवा फूंकने के लिए एक पाइप ओर होता है, इस पाइप में कोई छेद नहीं किया जाता, बाकी चारों पाइपों में छेद किये जाते हैं।

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बांसुरी

इस वाद्ययंत्र को बांस या मोटे रिंगाल से निर्मित किया जाता है, जिसे केवल कुशल कारीगरों द्वारा ही बनाया जाता हैं। उत्तराखंड के लोकगीतों खुदेड़ अथवा झुमैला गीतों के साथ बांसुरी का प्रयोग भी किया जाता है और खासतोर पर वनों में पशुचारक बजाते हुए नृत्य करते है संगीत में भी बांसुरी की धुन का प्रमुख स्थान है जिसकी धुन हर किसी को मोहित कर देती है l

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रणसिंघा और भंकोर

तुरही, रणसिंघा और भंकोर तीनों ही लगभग एक-दूसरे से मिलते जुलते वाद्य यंत्र हैं, प्राचीन काल में इनका प्रयोग युद्ध के समय किया जाता था। तांबे से निर्मित यह वाद्य यंत्र एक नाल के रूप में होता है जो मुख की ओर संकरा दूसरी और चौड़ा होता है। इसका प्रयोग मेवाड़ राजस्थान में भी देखने को मिलता है l

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मोछंग/मोरछंग

यह लोहे की पतली शिराओं से निर्मित एक छोटा सा वाद्ययंत्र है, जिसे होठों पर स्थिर रखकर अँगुलियों से बजाया जाता है। अँगुली के संचालन तथा होठों की हवा के प्रभाव से मोछंग में से मधुर स्वर निकलते हैं l

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तो यह थे उत्तराखंड के प्रमुख वाद्य यंत्र परन्तु यह दुर्भाग्य है कि उत्तराखंड बनने के बाद यह गायब होने लगे है और उत्तराखंड के अधिकाँश लोक वाद्य आज या तो लुप्त होने को हैं या लुप्त हो चुके हैं और यह बेहद दुःख की बात है कि राज्य की नई पीढ़ी के कानों में अब इन सुरीले यंत्रों का संगीत बेहद कम सुनने को मिलता है और कइयों ने तो सुना ही नहीं हैl 

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