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फ्योलड़ीया पहुंचा 2 करोड़ व्यूज़ के पार। जानें क्यों औरों से अलग है ये गीत ! पढ़ें रिपोर्ट !!

स्वर्गीय श्री शिव प्रसाद पोखरियाल के मूल शब्दो को जब ईशान डोभाल के संगीत में घोल कर किशन महिपाल के कंठ से दुबारा हकीकत बनाया गया था, तो गीत में चार चांद लगे। शादी अधूरी थी जब तक ढोल या डीजे पर ये गाना न बजे, किसी के भी मोबाइल की प्ले लिस्ट उठा लो ये गाना जरूर होगा।नन्दा घुघुंटी पर्वत माला के बीच घुघुंटी ओढ़ कर अपने काम में मगन एक बांद के रूप लावण्य को देख कर आये एक कवि के मन के विचार नए जमाने के संगीत से सज कर जब भी गूंजे, हर एक के पैर थिरके। पर क्या सिर्फ पैर थिरकाने तक ही मकसद सीमित था या गीत और उसके शब्दो के महत्व को भी जानना जरुरी था। क्योंकि इस गीत के बाद उत्तराखंड की संस्कृति बचाने के स्वघोषित ठेकेदार मैशप और कवर के नाम ऐसा कलचवाणी पेश कर गए कि अब कोई 70 या 80 के दशक के गीत को जीवित करने की भी कोशिश करता है तो श्रोता उसे नकार देता है। कारण क्या है, भेड़चाल शॉर्टकट या संगीत की समझ के बिना कुछ भी कैसे भी पेश करके खुद को रक्षक बताना?

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आइये जरा बात करे उस गीत की जो उत्तराखंड की जनसख्या से भी दुगने लोगो के पास पहुचा। सवाल उभरते है कि 1 करोड़ के लगभग जनसख्या वाले राज्यभाषी गीत को उस राज्य से बाहर भी देखा और सुना गया जिसके लिए गायक और संगीतकार के साथ पूरी टीम बधाई की पात्र है। लेकिन क्यों देखा और सुना गया ये भी तो समझने समझाने का विषय है। उत्तराखंड के अलिखित इतिहास को गीतों, पवाड़ो, बाजूंबन्दों, कविताओं, ढोलक, मांगल गीतों, झुमैलो जागरों, कथाओ में समेटे उत्तराखंड को उसके असली वर्चश्व से ऐसे ही गीत बचाते और आगे ले जाते है। ताकि हमारी हर पीढ़ी तक को पता लगे कि हमारे पास विरासत के इतिहास में है क्या। पर इस गीत के रिलीज होने से लेकर 2 करोड़ व्यूज मिलने तक सबने देखा देखी और तुरंत प्रसिद्धि प्राप्ति के लिये नकल उतारनी शुरू कर दी जिससे ऐसे विरासती गीतों पर धूल जमनी शुरू हो गयी, मैश अप और कवर के दौर में ऐसे गीत ढक गए माटा का भरुला सबसे बड़ा उदाहरण है। (गुंजन डंगवाल, विशाल शर्मा की 80 के दशक की बेडु बद्दी परम्परा का गीत)

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असल में इस गीत में ऐसा क्या है, जो 2 करोड़ लोगो को भा गया। ये भी आम गीतों की तरह मैश अप या कवर के ढेर में रख देना चाहिए। फिर क्यों। तो जवाब है कि विरासत के उन शब्दो को समेट कर एक स्वर में पिरो कर जब नए संगीत के साथ सजा कर उसमे बीच में हल्के रैप का तड़का लगा के पेश किया गया तो श्रोता और दर्शक दोनो के लिए ये 12 व्यंजनों की थाली साबित हुआ। इसके बाद न जाने कितने रैप मैशप या कवर गीत आये पर किसी में इतना दम नही जो इसकी जगह ले सके। तो साबित क्या होता है जिंदा लोकगायकों के 6 से 7 मिनट के गीतों की 2 लाइनों को पकड़ कर 3 मिनट का गिटार बजा कर ऑटो ट्यून के सहारे साढ़े तीन मिनट में पूरा गाना खत्म कर देना कोई गायिकी नही है, या ड्रोन के चार शॉट लेकर नथुली पिछोड़ पहन कर चार बार बेतरतीब तरीके से कमर लचकाना कोई विरासत या संस्कृति को आगे बढ़ाना नही है। बल्कि अगर विरासत आगे बढानी तो हमे उन लोक गीतों को जिंदा करना है जो कभी टेप रिकॉर्डर पर जमा किये गये जो कभी रेडियो के माध्यम से हम तक पहुचे। जो गीत पहाड़ की घस्येरियो की स्वर लहरियो में एक काँठे से दूसरे काँठे तक पहुचते थे।

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उन गीतों को जिंदा करना होगा जिनकी गुनगुनाहट के साथ की थपकी से दादी पोते को सुलाकर खेतो में जाती थी। वो गीत जिंदा करने होंगे, जिनमे जीजा स्याळी के रिश्ते की मर्यादा और देवर भाभी के रिश्ते की पवित्रता थी। आप गाइये, आपको रोका किसी ने नही है, पर आप क्या गा रहे है, वो तो समझने की कोशिश कीजिये। ल और ळ में फर्क समझिए उत्तराखंड की विरासत को समझिए संगीत स्वर और सुर समझिए। तब गीत गाइये। वरना जिंदा गायको के गीतों को गाकर दुबारा जिंदा करने का ढोल पीटकर खुद को “लोक गायक” की उपाधि से नवाजना सबसे बड़ी मूर्खता होगी।

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वैसे याद दिला दूं 2 करोड़ व्यू पार होने के बाद भी किशन महिपाल “लोक गायक किशन महिपाल” नही बने तो फिर आप में अठवांसी की तरह जल्दबाजी क्यों।
मेहनत कीजिए ,करते रहिये, जनता स्वयम उपाधि से नवाजेगी।

हिलीवुड़ न्यूज़ के लिए रेडियो ख़ुशी 90 .4 FM की उद्धघोषक रोशनी खंडूरी की रिपोर्ट।

Rj roshani

सुनिए फ्योंलड़िया गीत एक बार फिर से:

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