Breaking News

पुरातन काल से आस्था का प्रतीक है पीपल का पेड़ -पढ़े ये खास रिपोर्ट

ficus tree

हिन्दू संस्कृति में वैसे तो हर वस्तु को पवित्र माना जाता है व उसकी पूजा की जाती है। एक ऐसा ही वृक्ष है पीपल जिसे हिंदुओं में सबसे पवित्र माना जाता है। पुरातन काल से लेकर वर्तमान काल में भी इस वृक्ष की पूजा की जाती है। आस्था के प्रतीक से जुड़े होने के साथ साथ यह वृक्ष स्वास्थवर्धक भी है। पढ़े पीपल के वृक्ष से जुडी कुछ ख़ास बाते।

प्लास्टिक से दूर अपनाये पारम्परिक मालू से बने पत्तल (बर्तन)

इस वृक्ष को हिन्दू सभ्यता की शुरुआत के बाद से ही पूजा जाता है और इसके अत्याधिक धार्मिक महत्व भी हैं। भारतीय उपमहाद्वीप के मूल निवासीयों के अनुसार इस पवित्र पेड़ में औषधीय मूल्य का भरपूर धन शामिल है और इसका उपयोग कई बीमारियों के इलाज में सहायक है, जिसमें सांप काटने से अस्थमा, त्वचा रोग, गुर्दे की बीमारियाँ, कब्ज, खसरा, नपुंसकता और विभिन्न रक्त संबंधी आंखों के दर्द का इलाज, दांत, पीलिया व नाक से बहने वाले रक्त जैसी समस्यायें आदि शामिल है।

ficus tree

जन जन तक पहुंचेगी उत्तराखंड की संस्कृति, दिल्ली में उत्तराखंड संस्कृति के प्रचार के लिए गठित हुई अकादमी।

भारतीय संस्कृति में पीपल देववृक्ष है, इसके सात्विक प्रभाव के स्पर्श से अन्त: चेतना पुलकित और प्रफुल्लित होती है। स्कन्द पुराण में वर्णित है कि पीपल के मूल में विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में श्रीहरि और फलों में सभी देवताओं के साथ अच्युत सदैव निवास करते हैं।पीपल भगवान विष्णु का जीवन्त और पूर्णत:मूर्तिमान स्वरूप है। भगवान कृष्ण कहते हैं- समस्त वृक्षों में मैं पीपल का वृक्ष हूँ। स्वयं भगवान ने उससे अपनी उपमा देकर पीपल के देवत्व और दिव्यत्व को व्यक्त किया है। पीपल का वृक्ष लगाने वाले की वंश परम्परा कभी विनष्ट नहीं होती। पीपल की सेवा करने वाले सद्गति प्राप्त करते हैं। पीपल वृक्ष की प्रार्थना के लिए अश्वत्थस्तोत्र में पीपल की प्रार्थना का मंत्र भी दिया गया है। प्रसिद्ध ग्रन्थ व्रतराज में अश्वत्थोपासना में पीपल वृक्ष की महिमा का पूर्ण उल्लेख है।

चारधामों के कपाट अति शीघ्र होंगे बंद

अश्वत्थोपनयनव्रत में महर्षि शौनक द्वारा इसके महत्त्व का वर्णन किया गया है। अथर्ववेदके उपवेद आयुर्वेद में पीपल के औषधीय गुणों का अनेक असाध्य रोगों में उपयोग वर्णित है। पीपल के वृक्ष के नीचे मंत्र, जप और ध्यान तथा सभी प्रकार के संस्कारों को शुभ माना गया है। श्रीमद्भागवत् में वर्णित है कि द्वापर युग में परमधाम जाने से पूर्व योगेश्वर श्रीकृष्ण इस दिव्य पीपल वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यान में लीन हुए। यज्ञ में प्रयुक्त किए जाने वाले ‘उपभृत पात्र’ (दूर्वी, स्त्रुआ आदि) पीपल-काष्ट से ही बनाए जाते हैं। पवित्रता की दृष्टि से यज्ञ में उपयोग की जाने वाली समिधाएं भी आम या पीपल की ही होती हैं। यज्ञ में अग्नि स्थापना के लिए ऋषिगण पीपल के काष्ठ और शमी की लकड़ी की रगड़ से अग्नि प्रज्वलित किया करते थे।ग्रामीण संस्कृति में आज भी लोग पीपल की नयी कोपलों में निहित जीवनदायी गुणों का सेवन कर उम्र के अंतिम पडाव में भी सेहतमंद बने रहते हैं।
आज भी गाँवों में पीपल को आस्था का प्रतीक माना जाता है ,व श्रद्धा के इसकी पूजा की जाती है।

मिसेज सिंगापुर-2019 में छायी उत्तराखंड की अजिता

Facebook Comments

About Hillywood Desk

Check Also

मधुली नया गढ़वाली गीत हुआ रिलीज,संकल्प खेतवाल और दीपशिखा ने दी आवाज, पढ़ें।

मधुली नया गढ़वाली गीत हुआ रिलीज,संकल्प खेतवाल और दीपशिखा ने दी आवाज, पढ़ें।

उत्तराखंड के युवा गायक संकल्प खेतवाल (Sankalp Khetwal) और दीपशिखा की जुगलबंदी में मधुली (Madhuli) …

Leave a Reply

Your email address will not be published.

%d bloggers like this: