पहाड़ में खुशियां ले आया इगास का त्यौहार

0
711

Diwali Festival

वैसे तो उत्तराखंड में कई त्यौहार को मनाया जाता है, लेकिन कुछ त्यौहार ऐसे भी है जो अब सिर्फ नाम तक ही सिमित रह गए और उनके विषय में न तो ज्यादा कोई जानता है न उन त्यौहार को मनाता है। एक ऐसा ही विलुप्त होता त्यौहार है इगास। इगास उत्तराखण्ड की लुप्त होती दीपावली है इगास जिसके बारे में अब शायद बहुत कम लोग ही जानते है। दरअसल आजकल के पहाडी बच्चों को भी इगास का पता नहीं है कि इगास नाम का कोई त्यौहार भी उत्तराखंड में मनाया जाता है।

Diwali Festival

आज होंगे तृतीय केदार तुंगनाथ धाम के कपाट बंद , पढ़ें रिपोर्ट

दरअसल पहाडीयों की असली दीपावली इगास ही है, जो दीपोत्सव के ठीक ग्यारह दिन बाद मनाई जाती है, दीपोत्सव को इतनी देर में मनाने के दो कारण हैं जिसमे पहला और मुख्य कारण ये है कि – भगवान श्रीराम के अयोध्या वापस आने की खबर सूदूर पहाडी निवासीयों को ग्यारह दिन बाद मिली, और उन्होंने उस दिन को ही दीपोत्सव के रूप में हर्षोल्लास से मनाने का निश्चय किया। इसके बाद में छोटी दीपावली से लेकर गोवर्धन पूजा सब दीवाली के समय में ही मनाई जाती है लेकिन मुख्य दिवाली यानी बड़ी दिवाली को 11 दिन बाद इगास के नाम से मनाया जाती है।

मसूरी में होगा फ़िल्म कॉनक्लेव, उत्तराखंड सरकार ने उठाया बड़ा कदम

पहाडों में दीपावली को लोग दीये जलाते हैं, गौ पूजन करते हैं, अपने ईष्ट और कुलदेवी कुलदेवता की पूजा करते हैं, नयी उडद की दाल के पकौड़े बनाते हैं और गहत की दाल के स्वांले ( दाल से भरी पुडी़), दीपावली और इगास की शाम को सूर्यास्त होते ही औजी हर घर के द्वार पर ढोल दमाऊ के साथ बडई (एक तरह की ढोल विधा) बजाते हैं फिर लोग पूजा शुरू करते हैं, पूजा समाप्ति के बाद सब लोग ढोल दमाऊ के साथ कुलदेवी या देवता के मंदिर जाते हैं वहां पर मंडाण (पहाडी नृत्य) नाचते हैं, चीड़ की राल और बेल से बने भैला (एक तरह की मशाल) खेलते हैं, रात के बारह बजते ही सब घरों इकट्ठा किया मां काली को भेंट सतनाजा (सात अनाज) गांव की चारो दिशा की सीमाओं पर रखते हैं इस सीमा को दिशाबंधनी कहा जाता है इससे बाहर लोग अपना घर नही बनाते।

जिसको नहीं देखना चाहते थे बिग बाॅस 13 के अगले पड़ाव में वहीं बनी कैप्टैन

इगास मनाने का दूसरा कारण यह है की गढवाल नरेश महिपति शाह के सेनापति वीर माधोसिंह भन्डारी गढवाल तिब्बत युद्ध में गढवाल की सेना का नेतृत्व कर रहे थे, गढवाल सेना युद्ध जीत चुकी थी लेकिन माधोसिंह भन्डारी सेना की एक छोटी टुकडी के साथ मुख्य सेना से अलग होकर भटक गये सबने उन्हें वीरगति को प्राप्त मान लिया लेकिन वो जब वापस आये तो सबने उनका स्वागत बडे जोरशोर से किया। ये दिन दीपोत्सव के ग्यारह दिन बाद का दिन था इसलिए इस दिन को भी दीपोत्सव जैसा मनाया गया, उस युद्ध में माधोसिंह भण्डारी गढवाल-तिब्बत की सीमा तय कर चुके थे जो की वर्तमान में भारत-तिब्बत सीमा है।

भारत के बहुत से उत्सव लुप्त हो चुके हैं, बहुत से उत्सव तेजी से पूरे भारत में फैल रहे हैं, जैसे महाराष्ट्र का गणेशोत्सव, बंगाल की दुर्गा पूजा, पूर्वांचल की छठ पूजा, पंजाब का करवाचौथ गुजरात का नवरात्रि में मनाया जाना वाल गरबा डांडिया हर उत्सव को मनाना गलत नहीं है लेकिन अपने त्यौहार को भूलना गलत है। इगास भी एक ऐसा ही त्यौहार है जो विलुप्त होने वाले त्यौहारों की श्रेणी में है, इसका मुख्य कारण बढता बाजारवाद, क्षेत्रिय लोगों की उदासीनता और पलायन है ।

अगर हाल यही रहा और अगरपहाड़ो में पलायन ऐसे ही बढ़ता रहा तो हमारे सारे त्यौहार ऐसे ही खत्म होते जायेगे। ये त्यौहार अपने आप में बहुत महत्व रखते है अगर इनके महत्व को समय पर नहीं समझा जायेगा तो ये भी समय के साथ खत्म हो जायेगे और फिर हमे ये त्यौहार सिर्फ बड़े बुजुर्गो से ही सुने को मिलेंगे। कुछ लोग अब इन त्योहारों का महत्व समझने भी लगे है। बाकी वर्षो के मुकाबले इस वर्ष इगास को लेकर लोगो में ज्यादा ख़ुशी नजर आयी। शहरों में रहने वाले लोग भी इस पर्व के लिए वापस अपने पहाड़ो में लौट रहे है। यह एक शुभ संकेत भी है की अगर लोग इसी प्रकार सचेत रहेंगे तो उत्तराखंड के पर्वो को खत्म होने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

Facebook Comments