विनाश के निशाने पर उत्तराखंड, अधिकतम तापमान में हो रही बढोत्तरी

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Destruction in Uttarakhand

उत्तराखंड जो हमेशा अपनी सुंदरता के लिए पहचाना जाता है। जहाँ पर ठंडी हवाएं व शीतल जल बहता है। कुछ समय से उत्तराखंड का वातावरण पूर्णतय बदलने लगा है, जहां पहले 12 महिने ठंड व मौसम सदाबहार रहता था वहां पर अब धीरे धीरे मौसम बदलाव हो रहा है अब पहले जैसी ठंड नहीं होती न पहले की तरह नदिया भरी दिखाई देती और शायद वातावरण में इस बदलाव का कारण हम ही लोग है। हमने चारो तरफ इतना प्रदूषण फैला दिया है की कुछ भी साफ़ नहीं रह गया है ग्लेशियर तेज़ गति से पिघल रहे है वातावरण दूषित होने के कारण कई बिमारियों का खतरा बढ़ गया है और अगर हाल यही रहा तो आने वाले वक़्त में विनाश होना तय है।

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ईएनजे के शोध के अनुसार उत्तराखंड, हिमांचल प्रदेश समेत तमाम हिमालयी राज्यों में अब गर्म हवाएं या लू चलने की घटनाएं होने लगी हैं तथा यह साल दर साल बढ़ भी रही हैं। इन राज्यों में गर्मियों के दौरान अधिकतम तापमान में चार डिग्री तक की बढ़ोत्तरी रिकॉर्ड की गई है। सर्दियों में भी आधा डिग्री तापमान अधिक हो चुका है। सर्द दिनों की संख्या में 30-35 फीसदी की कमी हुई है। गर्म दिन बढ़े हैं। अकेले उत्तराखंड और हिमांचल प्रदेश के करीब एक करोड़ लोगों के जीवन पर प्रतिकूल असर हुआ है और बीमारियों का खतरा दोगुना हुआ है।

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रिपोर्ट के अनुसार इससे दो बड़े खतरे सामने आए हैं एक विषाणुजनित रोग और दूसरा रोगवाहक जनित बीमारियों में भारी बढ़ोत्तरी। इस शोध में जमीनी स्तर पर एकत्र किए गए आंकड़े बताते हैं कि महज पिछले आधे दशक में ही इन बीमारियों में दो सौ फीसदी तक की बढ़ोत्तरी देखी गई है।

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पर्वतीय क्षेत्र में जो घाटी वाले इलाके हैं, वहां मार्च के आखिरी महीने से लेकर मई के अंत तक लू यानि गर्म हवाएं चलने की घटनाएं हो रही हैं। यह स्थिति तब पैदा होती है जब तापमान सामान्य से चार डिग्री और ज्यादा बढ़ जाए। इससे घाटी में बसी आबादी ज्यादा प्रभावित है। मौसम विभाग के पूर्व महानिदेशक डॉ. के. जे. रमेश ने कहा कि पहाड़ी क्षेत्रों में गर्म हवाएं बढ़ना नई समस्या है, पहले ऐसी घटनाएं दुर्लभ होती थी, लेकिन अब गर्मियों के तीन महीनों मार्च-मई के दौरान यह आम हो गई हैं क्योंकि औसत तापमान भी बढ़ रहा है।

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समुद्रतल से करीब तीन हजार की फीट की ऊंचाई पर पहाड़ी क्षेत्र आरंभ होता है। करीब चार हजार फीट की ऊंचाई पर नैनीताल के निकट एक गांव है ज्योलीकोट। यह गांव घाटी में है। चारों तरफ पहाड़ी क्षेत्र है। गर्म हवाओं ने लोगों की दिनचर्या बदल दी है। स्थानीय निवासी 75 वर्षीय गोबिन्द सिंह बोरा बताते हैं कि वे युवावस्था में मई-जून के महीने में कोट पहनकर कार्यालय जाया करते थे। लेकिन अब गर्मी इतनी ज्यादा है कि इन महीनों में बिना छाता के निकलें तो लू लगना तय है। दूसरा बदलाव वह यह देखते हैं कि इस पहाड़ी इलाके में मच्छरों की भरमार हो गई है। मच्छर जनित बीमारियां भी बढ़ रही हैं। वे कहते हैं कि ज्यादा पीछे नहीं जाएं तो एक दशक पहले तक इस गांव में लोग पंखों का इस्तेमाल नहीं करते थे, लेकिन अब बिना पंखे के रह नहीं सकते।

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हिमालयन एनवायरमेंटल स्टडीज एंड कंजर्वेशन ऑर्गेनाइजेशन (हैस्को) देहरादून के प्रमुख डॉ. अनिल प्रकाश जोशी के अनुसार यह खतरा उत्तराखंड के हर हिस्से में बढ़ा है। यदि बढ़ती गर्मी के इन खतरों से निपटने के लिए स्वास्थ्य तंत्र को मजबूत नहीं किया, तो खतरा और बढ़ेगा। पालमपुर (हिमाचल प्रदेश) में स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन बायोरिसोर्स टेक्नोलॉजी (आईएचबीटी) के निदेशक डॉ. संजय कुमार बताते हैं कि गर्म हवाओं ने पर्वतीय क्षेत्र के पारिस्थिकीय तंत्र को ही प्रभावित किया है। कुछ साल इस प्रयोगशाला में पूर्व गुलाब की एक ऐसी किस्म देखी गई जिसमें कांटे गायब हो चुके थे। दूसरे, बढ़ती गर्मी के कारण पालमपुर देश का दूसरा सर्वाधिक बारिश वाला स्थान बन रहा है। जबकि यह दर्जा कुछ समय पूर्व तक यहां से करीब 60 किमी दूर स्थित धर्मशाला को प्राप्त था। इस क्षेत्र में मच्छर जनित तथा जीवाणु जनित बीमारियों में लगातार बढ़ोत्तरी हो रही है।

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राज्य में डेंगू, मलेरिया तथा अन्य विषाणु रोगों में इजाफा हुआ है। हिमाचल प्रदेश के कई ऊंचाई वाले इलाकों में तापमान में वृद्धि के कारण पांच हजार फुट की ऊंचाई पर भी आम उगने लगे हैं तथा यहां का परंपरागत फल सेब का उत्पादन घटने लगा है। खबर है कि सेब का आकार घट रहा है। गर्मी के कारण सेब समय से पहले ही पक जा रहे हैं। कुछ फसले पैदा होने से पहले ही खराब हो जा रही है। वातावरण पूर्णतय दूषित हो चूका है, जिस वजह से सजीवों की वृद्धि सही नहीं हो पा रही है और अगर हाल यही रहा तो पृथ्वी का विनाश लगभग तय है।

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