बामणी 2 गीत की रचना का क्या था उद्देश्य जानना जरुरी है – देखें पलायन पर कटाक्ष – गीत के माध्यम से

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Bamni 2

रुद्रप्रयाग जिले के युवा लोकगायक नवीन सेमवाल जो कि  मेरी बामणी गीत से सुर्ख़ियों में आए थे और उत्तराखंड संगीत जगत में अपनी एक अलग पहचान बना चुके हैं ,एक बार फिर से नवीन सेमवाल ने बामणी गीत की रचना की और इस बार कुछ अलग करने का मन बनाया और इस बार उत्तराखंड की वर्तमान स्थिति को दर्शकों के सामने रखा और नाम दिया Garhwali song Bamani 2 sun lye jara बामणी 2 सुण ल्ये जरा।

 

बामणी २ सुण ल्ये जरा गीत हार्दिक फिल्म्स के यूट्यूब चैनल पर रिलीज़ हो चुका है और श्रोताओं ने गीत की खूब सराहना की है, अगर आपने गाना सुना है तो आप इसके मूल अर्थ को जान गए होंगे आखिर रचनाकार क्या सन्देश देना चाहता है | जो दरससल इस गीत में एक वृद्ध ब्राह्मणी (बामणी ) और नेपाली मूल के युवक के बीच का संवाद दिखाया गया है होता यूँ ही कि बामणी अपने गेंहू पिसवाने चक्की पर गई हुई है और अब अपने घर की तरफ जाने की तैयारी में है किन्तु अब इतना सामर्थ्य नहीं रह गया है उसके शरीर में कि पहाड़ की खड़ी चढ़ाई पर चल सके और ऊपर से बोझ उठा सके ,इसी बीच उसकी नजर वहां बाजार में एक नेपाली मूल के युवक पर पड़ती है जो बाजार में हर छोटे मोटे काम करता है जो दौड़ा भागी ही करता रहता है कभी किसी की सब्जी उतार रहा है तो कभी यात्रियों का सामान ढो रहा है बामणी कहती है अरे कांछा! मेरी बात सुन मेरा घटवाडी ( पीसे हुए गेंहू ) को मेरे घर तक पहुंचा दे मेरे से नहीं ले जाया जाएगा और फिर कहानी शुरू होती है अपने अपने दुःख बताने की कांछा भी कहता है रामरो भन्यो हजूर! ले तो जाऊंगा पर 500 रूपये लूंगा और मोल भाव की बातें होनी लगती हैं और शायद 300 तक में बात बन ही जाती है।

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ये तो था गीत की शुरूआती पंक्तियाँ जो की मोल भाव पर ही बनाई गई है जैसे जैसे पहाड़ की चढ़ाई पर दोनों जाने लगते हैं बामणी अपना दुखड़ा उसे सुनती रहती है अब मैं और पंडित जी बुजुर्ग हो गए हैं कौन करेगा अब हमारा काम हमारा घर की एकमात्र आय पंडिताई ही थी पर अब तो 10, 12 गाँव की जजमानी भी छूट गई है कैसे गुजारा होगा अब। और अपने दुःख याद करते करते रास्ता काटते हैं बामणी कहती है बहु और बेटा तो अपने बच्चों के साथ शहरों में बस चुके हैं उनकी तरफ से हम पर क्या बीत रही है उन्हें क्या अहसास होगा जब हाल चाल जानने के लिए एक फोन तक नहीं करते हैं अब तू ही सहारा है हमारा।

 

नेपाली युवक भी अपनी व्यथा लगा ही लेता है मैं भी रोजगार की तलाश में अपना घर देश छोड़ के आया हूँ। और जो भी काम मिले ख़ुशी खुशी कर लेता हूँ मेरे मन में कोई लालसा नहीं है बस गुजारा होना चाहिए। मैं भी अब यही बस जाऊँगा सब्जी उगाऊंगा और सारे काम करूँगा चाहे हल लगाना हो खेती बाड़ी हो गढ़वाल मुझे भा गया यहीं बस जाऊंगा। युवा गायक नवीन सेमवाल ने बहुत ही सुन्दर रचना की है और साथ में पूनम सती ने भी बहुत ही सुन्दर आवाज दी है।

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गीत के अंत में बामणी कहती है तेरे ही सहारे ही पूरा गढ़वाल है और बेटियों के डोले तक तुम उठाते हो हमें तुम पर आँख मुंद कर विश्वास है जवाब में नेपाली युवक कहता है मैं एक डुट्याल कहाँ कहाँ जाऊंगा सारे गढ़वाल का बोझ तो मेरे ही सर पर आ गया है।
इस गीत को सुनकर एक सीख जरूर मिलती है कि पहाड़ के लोग ही पहाड़ में नहीं रहना चाहते अपनी सुख सुविधाओं के लिए अपना घर छोड़ के या तो किराये के मकानों में दिन काट रहे हैं या शहर की भीड़ भाड़ में कहीं खो गए हैं।
मानो न मानो हकीकत यही है।

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इस गीत को हार्दिक फिल्म्स ने प्रस्तुत किया है और कमान सिंह तोपवाल इसके सह निर्माता हैं | अपनी मिट्टी से दूर कमान सिंह अपनी बोली भाषा को लगातार सहयोग करते आये हैं, उनके और उनकी टीम द्वारा उत्तराखंडी कलाकारों को लगातार न्यूजीलैंड भी बुलाया जाता है और को प्रोत्साहित किया जाता रहा है दूर भाष पर तोपवाल जी ने हिली वुड न्यूज़ को बताया की बहुत जल्द वहां पर बाडुली संस्था द्वारा फिर से रंगारंग कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा| हिलीवुड न्यूज़ तोपवल साहब द्वारा बोलीभाषा को प्रचारित करने के लिए जो कार्य किया जा रहा है उसके लिए धन्यवाद देता है |
बामणी २ गीत में एक बार फिर से विनोद चौहान के संगीत को लिया गया है जो कि बामणी में भी थे उनके संगीत निर्देशन की बात ही कुछ और है |

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