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अनुराधा निराला,संतोष खेतवाल ने गीत एवं स्केच के जरिए दिखाया तीलू रौतेली का जीवन।

उत्तराखंड देवभूमि तो है ही ये वीरों की भूमि भी है,यहाँ कई महापुरुषों एवं वीरांगनाओं ने जन्म लिया है। जिन्होंने अपने शौर्य, बल साहस एवं बलिदान से इस धरती का मान बढ़ाया है ,ऐसी ही एक वीरांगना थी तीलू रौंतेली जिन्होंने मात्र 15 वर्ष की आयु में बड़े बड़े योद्धाओं को परास्त किया लगातार 8 वर्षों तक युद्ध करके इतिहास में सदा के लिए अमर हो गई। 

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तीलू रौंतेली के बारे में आपने कई बार सुना एवं पढ़ा होगा और कई गीतों में इस वीर बाला के अदम्य साहस का गुणगान सुना होगा,आज ही रिलीज़ हुए एक गीत तीलू रौतेली जिसे संतोष खेतवाल एवं अनुराधा निराला ने स्वरबद्ध किया है,इस गीत में स्केच के माध्यम से तीलू रौंतेली के जीवन को दर्शाया गया है,इसे संगीत से रणजीत सिंह ने सजाया है।

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स्टूडियो में गीत का विमोचन करती तीलू रौंतेली गीत की टीम

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उत्तराखंड के इतिहास में शायद ही कभी ऐसी वीरांगना का जन्म हुआ हो जिसने अपने साहस एवं वीरता की मिशाल पेश की है।

तीलू रौतेली का जीवन परिचय : 

तीलू रौतेली के जन्म को लेकर कोई स्पष्ट तिथि नहीं हैं लेकिन गढ़वाल में तीलू का जन्म 8 अगस्त को ही माना जाता है और 8 अगस्त 1661 को ही तीलू रौंतेली का जन्म माना जाता है। गढ़वाल और कत्यूरी राजाओं के बीच युद्ध छिड़ता रहता था और कत्यूरी राजाओं को कई बार तीलू के दोनों भाइयों भगतु और पथ्वा ने धूल चटाई थी,और तीलू ने भी बचपन में ही अपने जुड़वा भाइयों से अस्त्र शस्त्र की दीक्षा ले ली थी,मात्र 15 वर्ष की आयु में तीलू रौतेली की सगाई इडा गाँव(पट्टी मोंदाडस्यु) के सिपाही नेगी भुप्पा सिंह के पुत्र भवानी नेगी के साथ हो गई थी लेकिन इन्ही दिनों गढ़वाल में कन्त्यूरों के लगातार हमले हो रहे थे, और इन हमलों में कत्युरियों के खिलाफ लड़ते-लड़ते तीलू के पिता ने युद्ध भूमि में प्राण न्यौछावर कर दिये।इनके प्रतिशोध में तीलू के मंगेतर और दोनों भाइयों भगतु और पथ्वा ने भी युद्धभूमि में अप्रतिम बलिदान दिया। जिसके बाद तीलू ने शादी नहीं करने का फैसला लिया।

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और कुछ ही दिनों बाद तीलू रौंतेली ने माता मैणा से कांडा कौथिग (मेले) में जाने का आग्रह किया लेकिन माता मैणा ने ऐसे शब्द कहे”तीलू तू कैसी है, रे! तुझे अपने भाइयों की याद नहीं आती। तेरे पिता का प्रतिशोध कौन लेगा रे! जा रणभूमि में जा और अपने भाइयों की मौत का बदला ले। ले सकती है क्या? फिर खेलना कौथीग”
अगर तूने रण में धामशाह को हरा दिया तो तेरा नाम सदैव अमर रहेगा और पहाड़ियों की लाज तेरे हाथ में है ,मेरा आशीर्वाद तेरे साथ है ,जा प्रतिज्ञा कर ले अब तू राजा धामशाह का खात्मा करके ही लौटेगी फिर कांडा कौथिग जाना।

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तीलू के बाल मन से कौथिग की बात तो हट गई लेकिन प्रतिशोध की ज्वाला धधक गई और माँ के वचनों को सुनकर कुलदेवी राजराजेश्वरी का आशीर्वाद लेकर निकल पड़ी रणभूमि में अपनी बिंदुली घोड़ी (बिंदुली -काली और सफ़ेद )के साथ अपनी दो सहेलियों बेल्लु और देवली को लेकर जिससे कत्यूरी सैनिकों में हाहाकार मच गया और तीलू की सेना एक के बाद एक विजय पताका लहराते रहे।और इनका विजय गान घीमंडु ने अपनी हुड़की से सुनाया।

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भिलण भौंण के युद्ध में तीलू की दोनों सहेलियां बेलु और देवली वीरगति को प्राप्त हो गई।चौखुटिया तक गढ़ राज्य की सीमा निर्धारित कर देने के बाद तीलू अपने सैन्य दल के साथ देघाट वापस आयी,कालिंका खाल में तीलू का शत्रु से घमासान संग्राम हुआ, सराईखेत में कन्त्यूरों को परास्त करके तीलू ने अपने पिता के बलिदान का बदला लिया; इसी जगह पर तीलू की घोड़ी “बिंदुली” भी शत्रु दल के वारों से घायल होकर तीलू का साथ छोड़ गई।

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सात वर्ष की लड़ाई लड़ने के बाद तीलू का शरीर पूरी तरह से टूट गया और फैसला लिया कि अब कांडाखाल लौटा जाए
और नयार नदी को देखकर विश्राम करने का विचार बनाया और थकान मिटाने के लिए नयार के शीतल जल में स्नान करने का मन था,लेकिन तीलू ने सोते हुए अंगरक्षकों को नहीं जगाया और अकेले ही नदी में बिना किसी सुरक्षा के चली गई नदी में पानी पीते समय उसने अपनी तलवार नीचे रख दी और जैसे ही वह पानी पीने के लिए झुकी, उधर ही छुपे हुये पराजय से अपमानित रामू रजवार नामक एक कत्यूरी सैनिक ने तीलू की तलवार उठाकर तीलू की पीठ में घोंप दी मरते मरते भी वीरता का पाठ सिखा गई और जिस कायर ने पीठ पर वार किया उसे भी अपनी कटार से मृत्युलोक भेज दिया
बैरी का वार इतना प्राणघातक था जिससे वीरांगना तीलू ने अपने प्राण नयार नदी के तट पर ही त्याग दिए,और सदा के लिए अमर हो गई।

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माता मैणा के वचन तो पूरे हो गए लेकिन जो इच्छा तीलू के मन में कांडा कौथिग की थी वो उनके साथ ही चली गई,
इस वीर बाला की याद में हर वर्ष आज भी कांडा ग्राम व बीरोंखाल क्षेत्र के निवासी हर वर्ष कौथीग (मेला) आयोजित करते हैं और ढ़ोल-दमाऊ तथा निशाण के साथ तीलू रौतेली की प्रतिमा का पूजन किया जाता है।

गढ़वाल में तीलू रौंतेली रणभूत के रूप मैं भी नचाई जाती है ,तीलू रौतेली की स्मृति में गढ़वाल मंडल के कई गाँव में थड्या गीत भी गाये जाते हैं।

“ओ कांडा का कौथिग उर्यो
ओ तिलू कौथिग बोला
धकीं धे धे तिलू रौतेली धकीं धे धे
द्वी वीर मेरा रणशूर ह्वेन
भगतु पत्ता को बदला लेक कौथीग खेलला
धकीं धे धे तिलू रौतेली धकीं धे धे”

इसी कहानी को गीतकार संतोष खेतवाल ने गीत का रूप देकर बहुत ही शानदार बताया है। गीत को स्केच के जरिए दर्शकों तक दिखलाने का कार्य गौरी बख्सी ने किया है ,आप भी तीलू रौतेली के जीवन पर आधारित इस गीत को यूट्यूब पर देख सकते हैं।

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