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14 नवंबर से चमोली में एक सप्ताहिक ”गौचर मेले ”का होगा आयोजन, मेले की तैयारियां हुई शुरू

Gaucher Mela Festival

भारत में कई मेलो का आयोजन होता है और ये मेले संस्कृति व विचारो का मिलन केंद्र होते है। जिनकी वजह से कई समुदायों की संस्कृति देखने को मिलती है और इन्ही मेलो में मेले का आयोजन होता है हमारे उत्तराखंड के चमोली जिले में जिसे गौचर मेले के नाम से जाना जाता है। जो की नवंबर में आयोजित होने वाला सबसे बड़े मेलो में से एक माना जाता है।

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आपको बता दें की तिब्बत में लगने वाले दो जनपदों पिथौरागढ व चमोली में भोटिया जनजाति के लोगों की पहल पर शुरू हुआ यह मेला उत्तराखण्ड के चमोली जनपद में जीवन के रोजमर्रे की आवश्यकताओं का हाट बाजार और यही हाट बाजार धीरे-धीरे मेले के स्वरूप में परिवर्तित हो गए । चमोली जनपद में नीति माणा घाटी के जनजातिय क्षेत्र के प्रमुख व्यापारी एवं जागृत जनप्रतिनिधि स्व0 बालासिंह पॉल, पानसिंह बम्पाल एवं गोविन्द सिंह राणा ने चमोली जनपद में भी इसी प्रकार के व्यापारिक मेले के आयोजन का विचार प्रतिष्ठित पत्रकार एवं समाजसेवी स्व.गोविन्द प्रसाद नौटियाल के सम्मुख रखा। गढवाल के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर के सुझाव पर माह नवम्बर, 1943 में प्रथम बार गौचर में व्यापारिक मेले का आयोजन शुरू हुआ बाद में धीरे-धीरे औद्योगिक विकास मेले एवं सांस्कृतिक मेले का स्वरूप धारण कर लिया।

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पहले इस मेला का आयोजन अलग अलग समय समय पर किया जाता था, लेकिन अब कुछ समय से इस मेले का आयोजन 14 नवंबर को भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के जन्मदिन के अवसर पर आयोजित किया जाता है। यह मेला एक हफ्ते तक चलता है। साथ ही इसमें कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों व हाट बजारो का भी आयोजन होता है इस बार भी गौचर मेले का भव्य आयोजन होने जा रहा है। जिसमे उत्तराखंडी संस्कृति की झलक तो देखने को मिलेगी ही साथ ही बाहरी संस्कृति व बॉलीवुड के कलाकार भी यहां पर आयोजित सांस्कृतिक प्रोग्रामो में प्रतिभाग करेंगे।

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यह मेला संस्कृति, बाजार, उद्योग तीनों के समन्वय के कारण पूरे उत्तराखण्ड में लोकप्रिय बन गया है। मेले में जहां रोज की आवश्यक वस्तुओं की दुकाने लगाई जाती है वहीं जनपद में शासन की नीतियों के अनुसार प्राप्त उपलब्धियों के स्टॉल भी लगाये जाते हैं। मेले में स्वास्थ्य, पंचायत, सहकारिता, कृषि, पर्यटन आदि विषयों पर विचार गोष्ठियां होती है तथा मेले में स्वस्थ मनोरंजन का आयोजन भी किया जाता है। इस हेतु प्रत्येक वर्ष पर्यटन विभाग, उत्तराखण्ड द्वारा अनुदान की धनराशि उपलब्ध कराई जाती है।

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