अमित सागर की गढ़वाली ग़ज़ल ब्वे -बुबा मॉडर्न समाज की हकीकत है,जरूर सुनिए।

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अमित सागर इन दिनों अपनी ग़ज़लों से हर महफ़िल को गुलजार कर रहे हैं,गढ़वाली भाषा के संरक्षण एवं संवर्धन में अमित अपनी अहम् भूमिका निभा रहे हैं,कई सारे मंचों पर इनकी गजल संध्या ने श्रोताओं को इनकी ग़जलों का दीवाना बना दिया,अब तक इनकी कई ग़ज़ल रिलीज़ हो चुकी हैं जिन्हें श्रोताओं ने खूब पसंद किया,ग़ज़ल प्रेमियों को अमित सागर ने अपने ऑफिसियल चैनल से एक और शानदार प्रस्तुति भेंट कर दी है।

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बीते दिनों अमित सागर ने अपने ऑफिसियल चैनल से गढ़वाली ग़ज़ल गिलु सी अख़बार ह्वे गिन ब्वे-बुबा रिलीज़ की,गढ़वाली ग़ज़ल रत्न जगमोहन बिष्ट की लिखी इस खूबसूरत ग़ज़ल को अमित सागर ने कई मंचों पर गाया और श्रोताओं के ग़ज़ल प्रेम को देखते हुए इसका वीडियो तैयार कर लिया।

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अमित सागर ने उत्तराखंडी संगीत जगत में ग़ज़ल विधा से अपना अलग मुकाम हासिल किया है,डीजे पैटर्न हो लव सॉन्ग हो या अब ग़ज़ल गायिकी अमित सागर अपनी प्रतिभा से श्रोताओं को दीवाना बना रहे हैं,ब्वे-बुबा हमारे समाज की ही कहानी है जिसे जगमोहन बिष्ट ने अपने शब्दों से और अमित सागर ने अपनी आवाज के जरिए प्रस्तुत किया है।

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भारतीय समाज में एक संगठित परिवार की प्रथा थी लेकिन समय के साथ अब आपसी प्रेम में काफी कमी देखने को मिली अब भारत में भी एकल परिवार की सोच ने अपने पैर ने जमा दिए हैं,बच्चे अपने परिवार को लेकर या तो दूसरे शहरों में बस जाते हैं लेकिन उनके पीछे माँ बाप दयनीय जीवन जीते हैं,इस ग़ज़ल में भी इसी बात का जिक्र किया गया है,ग़ज़लकार जगमोहन बिष्ट ने समाज की इस स्थति को बड़ी खूबसूरती से जाहिर किया है,जैसे गीला अख़बार किसी काम का नहीं होता आज के समाज ने माँ बाप को भी उसी स्थति में लाकर खड़ा कर दिया है।

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अमित सागर अपनी गायिकी से हर बार श्रोताओं का दिल जीत लेते हैं,ऐसे ही इन्हें उत्तराखंड का ग़ज़ल सम्राट नहीं कहा जाता है,कभी श्रोताओं को अपने गीतों से जमकर थिरकाते हैं तो कभी ब्वे-बुबा जैसी भावनात्मक ग़ज़ल गाकर आँखों में आंसू ला देते हैं।

यहाँ सुनिए ब्वे बुबा गढ़वाली ग़ज़ल:

 

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