बुजुर्गों की परंपरा का वरदान है दयारा बुग्याल की मक्खन होली,विश्व भर में है अनोखी।

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देवभूमि उत्तराखंड सौंदर्य की खदान है यहाँ की खूबसूरत वादियां,बर्फ से ढके पहाड़ और मीलों तक फैले मखमले बुग्याल किसी को भी चंद पलों में अपना दीवाना बना लेते हैं,प्रकृति से यहाँ के निवासी कितना प्रेम करते हैं ये किसी से छुपा नहीं है जल जंगल और जमीन की रखवाली करने वाले देवी-देवताओं के प्रति आभार प्रकट करने वाले अनेक उत्सव मनाए जाते हैं जिनमें हरेला,फूलदेई जैसे कई त्यौहार शामिल हैं,उत्तरकाशी जिले के दयारा बुग्याल में अढूंडी उत्सव (बटर फेस्टिवल) दुनिया का ऐसा अनोखा उत्सव है जहाँ पर मक्खन की होली खेली जाती है।

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11 हजार फ़ीट की ऊंचाई पर स्थित दयारा बुग्याल जितना प्राकृतिक रूप से खूबसूरत है अब उतना ही बटर फेस्टिवल के लिए भी विश्व भर में ख्याति बटोर रहा है,भाद्रपद महीने की संक्राति को मनाया जाने वाला अढूंडी उत्सव समय के साथ बटर फेस्टिवल में बदल गया है,सदियों से चली आ रही ये परंपरा अब दुनिया के पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन चुकी है,कृष्ण जन्माष्ठमी की तरह ही यहाँ पर मटकी फोड़ का आयोजन किया जाता है।

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पहाड़ के असल जीवन को संजोता ये बटर फेस्टिवल इंसान और प्रकृति के बीच के रिश्ते को दर्शाता है,पशुपालन प्रारम्भ से ही आजीविका का साधन रहा है और उत्तरकाशी के रैथल,नटीण,भटवाड़ी,क्यार्क,बन्द्राणी के ग्रामीण सदियों से इस परंपरा को चला रहे हैं,गर्मियां शुरू होते ही यहाँ के ग्रामीण अपने मवेशियों को लेकर दयारा बुग्याल की ओर लेकर चले जाते हैं और मानसून ख़त्म होने पर वापस अपने गाँवों को लौट जाते हैं और लौटते वक्त ये अनोखा उत्सव अढूंडी उत्सव(बटर फेस्टिवल) प्रकृति एवं स्थानीय देवी देवताओं का अपने मवेशियों की रक्षा करने और दुधारू रखने पर खुशी खुशी वापसी पर दूध,मट्ठा,घी और मक्खन की होली आपस में खेलते हैं।ये परंपरा सदियों से चली आ रही है और बुजुर्गों की इसी परंपरा का आधुनिक रूप अब बटर फेस्टिवल ले चुका है।

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आज भाद्रपद की संक्राति है और सदियों से आ रही परम्परा को रैथल एवं आसपास के ग्रामीणों ने दुनिया भर से आए पर्यटकों के साथ इस अनोखी मक्खन होली का आगाज किया,इस अवसर पर ग्रामीण महिलाओं का पारम्परिक नृत्य रासो आकर्षण का केंद्र रहा।

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