जानिए क्यों पहाड़ों में शुभ अवसरों पर गाए जाते हैं मांगल गीत, जिनके बिना अधूरे हैं मांगलिक कार्य

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जानिए क्यों पहाड़ों में शुभ अवसरों पर गाए जाते हैं मांगल गीत जिनके बिना अधूरे हैं मांगलिक कार्य

पूरे विश्व में उत्तराखंड की संस्कृति की एक अलग पहचान है, उत्तराखंड की लोक परंपरा बड़ी समृद्ध है, यहां के लोग जो अपने पहले पीढ़ी के लोगों द्वारा किए गए कार्यों को आज भी पीढ़ी दर पीढ़ी बढ़ावा दे रहे हैं, ताकि समय भले ही बीतता चला जाए पर हमारी संस्कृति कभी ना बदले, ताकि आगे सभी को हमारी यह पारंपरिक संस्कृति हमेशा याद रहे, उसी तरह यहां एक परंपरा है मांगल गीतों की, जिनके बारे में हम आज आपको जानकारी देने वाले हैं.

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पहाड़ में शुभ कार्य जैसे शादी, मुंडन, जनेऊ संस्कार, गणेश पूजा व अन्य होते तो हैं, लेकिन इन्हें अलग बनाते हैं पहाड़ के मांगलिक गीत, सभी शुभ कार्यों की शुरुआत इन्हीं मंगल अथवा मांगल गीतों से होती है, इन गीतों को गानेवाली होती हैं पहाड़ की महिलाएं, उत्तराखंड के कई पहाड़ी इलाकों में आज भी शुभ कार्यों के दौरान इन मंगल गीतों को गाया जाता है. किसी भी मांगलिक कार्य में पंचनाम देवताओं को याद करने से ही इन मांगल गीतों की शुरुआत होती है, मांगलिक अवसरों पर बुजुर्ग गीदारों की कर्णप्रिय धुन जो माहौल ही बना देती है.

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हिंदू शास्त्रों में भी मांगल गीत गाने का उल्लेख मिलता है, मंगल गीतों में क्षेत्र विशेष के देव शक्तियों या शुभ वस्तुओं का जिक्र अलग तरीकों से होता है लेकिन भाव के स्तर पर ये सभी एक जैसे ही हुआ करते हैं, वर्तमान में उत्तराखंड के मांगल गीत अब विलुप्ति की कगार पर हैं, लोग अपनी लोक परम्परा को भूलते जा रहे हैं, अब शुभ कार्यों में अक्सर यूट्यूब पर मौजूद मांगलिक गीतों को फोन पर बजाकर काम चलाने लगा है, हालांकि कुछ पहाड़ी गांवों में अभी भी ये सुनने को मिल ही जाएंगे, काफी लंबे समय से मंगल कार्यों में गाए जाने वाले यह गीत एक अलग महत्त्व रखते हैं और इनके बिना कोई भी शुभ कार्य जैसे अधूरा सा है, कई क्षेत्रों में शुभ कार्यों के दौरान मंगल गीत गाने वाली महिलाओं को न्योता दिया जाता है और फिर कार्य समापन के बाद उन्हें रुपये, फल, वस्त्र, मिठाई आदि देकर सम्मानपूर्वक विदा किया जाता है.

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