पब्लिक रिव्यू : पहाड़ की हकीकत दिखलाती फिल्म “खैरी का दिन” देख रो पड़े दर्शक।

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उत्तराखंड का सिनेमा अब समय के साथ बदल रहा है,सिनेमाघरों के साथ ही गढ़वाली फिल्म डिजिटल प्लेटफार्म पर भी मिलने लगी हैं,पहाड़ के असल मुद्दों को स्क्रीन पर देखना एक दर्शक के लिए हकीकत से रूबरू होना है,पिछले वर्ष सिनेमाहाल में गढ़वाली फिल्म “खैरी का दिन” रिलीज़ हुई थी,यही फिल्म अब डिजिटल प्लेटफार्म पर रिलीज़ हो चुकी है दर्शक फिल्म को खूब पसंद कर रहे हैं।

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हार्दिक फिल्म्स ने बीते रविवार को अपने ऑफिसियल चैनल से “खैरी का दिन” रिलीज़ की,अब तक करीब 20 हजार से अधिक दर्शक फिल्म को देख चुके हैं, दर्शकों की जो प्रतिक्रियाएं फिल्म को देखकर मिल रही हैं वही संक्षेप में आप सभी तक पहुँचाने का प्रयास है।

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जनता तो जनार्दन है और जनता का आदेश सर आँखों पर रखेंगे ही “खैरी का दिन” पहाड़ी अंचलों की कहानी है इसीलिए ये फिल्म दर्शकों के दिलों में अपनी जगह बनाने में सफल हो रही है,फिल्म की पूरी कहानी कुलदीप यानि राजेश मालगुडी के जीवन पर आधारित है,गढ़वाल में खैरी का अर्थ दुःख होता है और कुलदीप के जीवन में तो दुःखों का पूरा पहाड़ है,बचपन में ही सर से मां का सहारा उठ जाता है पिता दूसरी शादी करते हैं और कुलदीप का लालन पालन सौतेली माँ के हाथों होता है, सौतेली माँ ने कुलदीप को अपनी माँ की कमी का अहसास कभी नहीं होने दिया लेकिन समय का पहिया फिर घूम गया और माँ भी चल बसी और अपने पीछे 3 बच्चों को छोड़ गई नौकरी के साथ भाई बहनों की जिम्मेदारी भी कुलदीप के कन्धों में आ गई।

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कुलदीप ने बड़े भाई का फर्ज बखूबी निभाया दोनों भाइयों को पढ़ा लिखाकर अपने पैरों पर खड़ा कर दिया,पहाड़ अपनी एकता के लिए अपनी अलग पहचान रखता है,गाँव में पहले बड़ा परिवार एक साथ रहता था हर सुख दुःख में सब एक दूसरे के भागीदार होते थे लेकिन मॉडर्न समाज ने सबको अलग थलग कर दिया और जॉइंट फैमिली कब सिंगल फैमिली में बदल गई पता ही नहीं चला, ये फिल्म भी इसी हकीकत को दर्शाती है, एक हँसता खेलता परिवार कब बिखर जाए कोई नहीं जानता, ये हम सबके गाँव की ही कहानी है बस इसे फिल्म का रूप मिल गया है।

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दर्शकों ने फिल्म के गीत संगीत को खूब पसंद किया अपने पसंदीदा कलाकार की सराहना भी की,फिल्म में वो सब कुछ देखने को मिला जो एक फिल्म को पूर्ण बनाती है,संवाद,अभिनय,के साथ ही फिल्म की कहानी दर्शकों को फिल्म से जोड़े रखने में कामयाब रही,फिल्म में विलेन एक ग्राम प्रधान किर्तू (राजेश रावत) है जो 25 सालों से गांव पर एकछत्र राज कर रहा है लेकिन अंततः गाँव वाले एक होकर इसे जड़ से उखाड़ने की ठान लेते हैं और कुलदीप को प्रधान चुन लेते हैं।गाँव की कमान तो कुलदीप के हाथों में आ गई लेकिन इस बीच कब घर बिखर गया उसे पता ही ना चल सका।

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बड़े भाई का कर्तव्य कुलदीप ने बखूबी निभाया लेकिन कहते हैं ना नारी जहाँ घर बना सकती है तो घर उजाड़ भी देती है,पूजा काला ने अपना किरदार बखूबी निभाया स्क्रीन पर भले ही वो नेगेटिव रॉल में थी लेकिन अपने किरदार से दर्शकों के दिलों में अपनी जगह बना ही दी, पूरी कहानी आप फिल्म में ही अच्छे से समझ सकते हैं यदि आपने देख ली तो आपकी भी फिल्म पर यही राय होगी। खैरी का दिन हमें यही सन्देश देती है कि एकता में ही शक्ति है एक ना हुए तो बिखरना तय है फिर अकेले ही “खैरी का दिन” काटना पड़ेगा।

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